Public Program

Public Program 1980-12-13

Location
Talk duration
56'
Category
Public Program
Spoken Language
English, Hindi, Marathi

Current language: Hindi, list all talks in: Hindi

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13 दिसम्बर 1980

Public Program

Bharatiya Vidya Bhavan, मुंबई (भारत)

Talk Language: Hindi | Transcript (Hindi) - Draft

1980-13 th . December: Sarvajanik Karyakram Aapki Chetana Me Atma Ka Prakash Jarurui Hae, Mumbai

विणुगोपालन साहाब ने आप से बहुत सुन्दर्ता से समझाया है कि हमारे अंदर जो कुंदलीनी शक्ति है उसको जागृत किये बगैर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता, कुछ भी मिल नहीं हो सकता और कोई तरीका नहीं है। क्योंकि परमात्मा को पाने के लिए परमात्मा को जानने के लिए आत्मा को जानना ज़रूरी है। जब तक आत्मा को नहीं जाना जाता है तब तक परमात्मा को कोई नहीं पहचान सकता है क्योंकि आत्मा ही परमात्मा को जानने की शक्ति है। जैसे हमारी आँखें खुले बगैर हम संसार को नहीं देख सकते हैं उसी प्रकार जब तक हमारी आत्मा जागृत नहीं होगी, सब बेकार की बातों से परमात्मा को नहीं जाना जाता है। यह सत्य है, इसमें कोई शक नहीं। इसके लोग नाराज भी हो जाएँ, बुरा भी मान जाएँ तो भी जो बात सही है, वही बात हमें कहने की है और इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं। क्योंकि अगर आप परमात्मा के खोज में निकले हैं, अगर आप उसको ही खोज रहे हैं, आप वाकई में खोजने वाले हैं। इसको कहते हैं कि आप ट्रू सीकर हैं। हृदय में आपको सिर्फ परमात्मा को ही मिलने का विचार है तब तो आपसे हम बात कर सकते हैं और बाकी फिर बात नहीं हो सकती। कारण यह है कि मनुष्य यह नहीं जानता है कि वो अपनी आत्मा से अभी तक संबंधित ही नहीं हैं। आत्मा आपको जानता है, आप आत्मा को जानते नहीं है। वो आपसे संबंधित नहीं हैं।

आपकी चेतना में आत्मा का कोई प्रकाश नहीं है, जरा सा भी नहीं है। जब यह प्रकाश हमारे अंदर आता है तब अपने अंदर से ही शक्ति बहना शुरू हो जाती है, यह वास्तविकता है। और यह एक जीवन्त क्रिया है, लीविंग प्रोसेस है। आप जिस तरह से अमीबा से इंसान बने है, उसी तरह से इंसान से भी आप उचे बन सकते हैं लेकिन उसी प्रकार बनेंगे। मनुष्य एक एक नये नये तरीके निकालता है कोई भी चीज़ के। परमात्मा का अपना तरीका बना हुआ है। उसने अपने आप के अंदर सारी चीज़ बना के रखी है, सिर्फ आपका कनेक्शन लगाने की बात है। जब तक परमात्मा से कनेक्शन नहीं हुआ, आत्मा से कनेक्शन नहीं हुआ तो फिर बाकी की सब चीज़े करने से फायदा क्या है। समझ लीजिए इसका कनेक्शन अगर मेंन से नहीं हुआ तो इस पर मेरे बात करने से फायदा क्या है? अभी वो आये थे, पईसाब कह गए चलो जाके अभी कनेक्शन लगा देता हूँ। एक बहुत ही प्रैक्टिकल, लोजिकल जिसको बात कहना चाहिए यह है कि अभी आत्मा से आपका किसी का संबंध है नहीं, आपके अंदर आत्मा का प्रकाश नहीं है।

अब बहुत से लोग कहेंगे कि माता जी पहले कन्दिल साफ करना चाहिए, फ़िर भी कन्दिल भी साफ करके रखो चाहे उसको रगड़ के रखो, मांज के रखो लेकिन उसके अंदर ज्योति नहीं है तो उसका कन्दिल का भी क्या अर्थ होने वाला? काहे के लिए मेंहनत कर रहे हैं लेकिन ये बात रुचिकर नहीं लगती। अगर कहा जाये कि किसी मेंहनत से नहीं होगा क्योंकि हम जिसे हम समझते हैं इससे हम कहते हैं हमें ये पसंद है 'I like it'; मराठी में कहते हैं 'मला थरा -अस्पष्ट'। ये कौन है, ये कौन कहता है कि मुझे पसंद है- ये आपका अहंकार है, इगो है। वो कहता है, ये मुझे अच्छा लगता है। इससे मुझे ये लाभ हो गया, उससे मुझे वो लाभ हो गया। क्या लाभ हो गया, सिर्फ आपका जो ईगो [ego] है, अहन्कार है। वो कुछ है। जब अहंकार प्लावित होता है, जब हम अहंकार को कुछ खाना देते हैं तो वो खुश हो जाता है। और जो प्रतिअहंकार, सुपर ईगो [Super Ego] है। उस से आप दु:ख पाते हैं। कंडिशनिंग से आप दुख पाते हैं और डीकंडीशनिंग [Deconditioning] जब करते हैं तब आप अपना इगो बढ़ाते हैं। इनसे परे परमात्मा है, इनसे परे आत्मा है। उसकी व्यवस्था परमेश्वर ने जो कि सारे सृष्टि का नियंता है, आपके अंदर कर रखी है। इसको आप मानें, चाहें नहीं मानें, लेकिन वो हैं। आप क्यों नहीं मानते? क्योंकि आपने उसे देखा नहीं, आपने उसे जाना नहीं, आपने उसे पहचाना नहीं।

लेकिन कम से कम, अपने ही भारत वर्ष में बहुत उंचे लोग हो गए हैं, जैसे आदि शंकराचार्य। उन्हों ने बताया कि आपके अंदर कुंडलिनी शक्ति है; कबीर हो गए। पूरा, कबीर, नानक, ज्ञानेश्वर, सब ने कहा है कि कुंडलिनी शक्ति का जागरण होना चाहिए। यही एक कार्य है। घूमा फिराके सब कुंडलिनी की बात करते हैं, चक्र की बात करते हैं, सब वही बात तो वही करते हैं। लेकिन कुंडलिनी जागृत नहीं करते, बात करने से क्या फायदा, अगर हम आप से दुनिया भर की बात भी करें, तो उससे फायदा क्या होने वाला है, बात, बात रह जाएँगी। बात से आपको फायदा क्या हुआ, आप अपना स्वार्थ देखें, 'स्वा' का अर्थ देखें, अपना 'स्व' जो है, वो है आपकी आत्मा, उसका आप अर्थ देखें, क्या उसका अर्थ लग गया है, मानें ये की जिस चीज़ के लिए आपका 'स्व' है, क्या वो कार्यान्वित है? वो कुछ कार्य कर रहा है, या कि वो एक तरफ बैठा हुआ है अपना और आप जैसे थे वैसे हैं।

इसका विचार पहले कर लेना चाहिए कि अगर हम परमात्मा को खोज रहे हैं असल में, इस मामले में इमानदार हैं, और हम परमात्मा को ही खोज रहे हैं, हमारे इगो को हम नहीं खोज रहे हैं, ऐसा विचार अगर आप अपने सामने रख लें, और फिर ये सोचे, कि ये करने के लिए क्या हमें कुछ करना होगा, क्यूंकि हम कुछ भी कर्म करेंगे, हमारा इगो बंधेगा कि नहीं बंधेगा, कर्म के अन्दर आप बंधेगे या नहीं बंधेगे । अकर्म होने के लिए यह कोई नो कोई घटना अंदर घटित होनी पड़ती हैं और वो जो है वो जीवंत घटना है, Spontaneous, उसको आप करा नहीं सकते; सर के बल खड़े होने से आप बीज उगा सकते हैं क्या? गीता पढ़ने से आप बीज उगा सकते हैं क्या? मंत्र बोलने से आप बीज उगा सकते हैं क्या? कूदने फांदने से आप बीज उगा सकते हैं क्या? किताबे पढ़ने से, गुरूवों को पैसा देने से, दुनिया भर के बाल मुँड़ाने से और चोगे पहनने से आप कर सकते हैं क्या? कबीर ने सब पे खुब मारा हुआ। यह सब करने से आप नहीं कर सकते हैं। अंदर की जागृती होनी चाहिए। सहज समाधी लागे! सहज अंदर में होना चाहिए।

अभी सहज योग भी एक साहब ने निकाले। याने लिमिट तो यह है कि पैसे कमाने के तरीके कितने लोग निकालते हैं, और बेवकुफ बनाने के उसकी कोई हद नहीं। क्योंकि लोग बेवकुफ हैं। जो असल आदमी होता है उसके पास लोग ही बहुत कम आएंगे। पहली पहचान यह है। जो असल होगा उसके पास कम ही लोग आएंगे। क्योंकि असल को खरीदने वाले ही कम होते हैं। नकल पर सब लोग मरते हैं। आप अगर कहें कि प्लास्टिक के फ्लावर बना दो तो हजारों बन जाएंगे। मेंबर बना लो चलो भाई ये भी मेंबर हो गए वो गए आपको एक चोगा पहना दिया चलो आप हो गए मेंबर। चलो उनके आप शिष्य हो गए। ना हमारे कोई शिष्य हैं ना ही हमारी कोई संप्रदा है। आपको अगर पार होना है तो आप आए हैं पार हो जाइए और यहाँ बैठिये जमीन पे। ना इसमें आप पैसा दे सकतें। एक यह सोचना चाहिए जिस चीज के लिए आप पैसा दे सकतें वो परमात्मा का कैसे हो सकता है? क्योंकि मंदिरों में पैसा लेते हैं, पोप पैसा लेता है और सारे दुनिया भर के जितने भी आचार्य लोग हैं पैसा लेते हैं इसलिए सब लोग सोचते हैं कि माता जी भी अगर पैसा नहीं लेती तो किस काम का होगा?

मैं पूछती हूँ कितना पैसा है आपके पास? आप मुझे क्या दे सकते हैं? आपके पास देने को है ही क्या? कौन सी ऐसी चीज आपके पास है जो इसका मूले दे दे? यह पत्थर और गोटे, इससे क्या आप इसका मूल्य देंगे?और किसी भी तरह की भावना लेकर चलने से भी क्या आपको परमात्मा मिल जाएंगे? किस तरह मैंने परित्याग कर दिया मेरे घर का? यह सब दिमागी जमाखर्च है। बोधी एक्रो बैट्स जिसे कहते हैं, कि मैंने घर छोड़ दिया, मैंने द्वार छोड़ दिया सब संसार छोड करके; परमात्मा ने संसार बनाया क्यों अगर उसको छोड़ने का होता तो? यह पलायन वादिता जो है, इसकी क्या ज़रूरत है? इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ती है कि मनुष्य इन चक्करों में जल्दी आ जाते हैं। किसी से कहा जाए कि देखिए अपने संसार में रह कर, घर में रह कर, अंदर ही घटना घटित होती है तो सोचता है अरे फिर इसमें क्या हुआ? मैंने शो आफ कहाँ किया, मैंने कहाँ अपने को दिखाया और आपको अगर वास्तव में पाना है, तो आप कहेंगे चलिए, इस सब बाह्य चीजों में, बाह्यान आडंबरों में कुछ नहीं रखा! और ये लोग आपसे बताएंगे भी कि बाह्य में कुछ नहीं सब अंदर हैं और कराएंगे सब बाह्य में और आप इस चक्कर में घूमते ही रह जाईएगा। दुख तो यह है कि आप खोजने वाले हैं, आप अनंत काल से परमात्मा को खोज रहे हैं और उससे बड़ा दुख यह है कि इस भरमार में आप भी खतम हो जाएंगे।

जो एक जिवन्त क्रिया है वो करने की शक्ती, क्षमता और उसकी पूरी सृष्टि परमात्मा ने आपके अंदर की है। आपने किया ही क्या है जरा सोचिए, अभी यह बड़ी बिल्डिंग बना दी तो सोच रहे हैं कि साहब हमने बड़ी बिल्डिंग बना दी; यह पत्थर पर पत्थर चड़ाएं हैं, कौन सी जिवन्त क्रिया की है, यहां! मरे को मरा बनाना और क्या किया है कोई एक भी जिवन्त कार्य मनुष्य ने करके दिखाया हो तो बताइये; जिवन्त कार्य सिर्फ जो आदमी आत्मा को पाता है वही कर पाता है, यह पहचान है आत्मा को पाने की कि आपके हाथ से जिवन्त कार्य होंगे कुंडलिनी का जागना जिवन्त कार्य है, इसे आप अपने आँख से देख सकते हैं; इसका पल्सेशन, आप उसका नाचना, उसका चढ़ना और उसका गिरना आप आँख से देख सकते हैं। जो कार्य आप लोग कर सकते हैं वो तो आप कर ही सकते हैं जैसे कोई कहे कि आप ध्यान लगा के बैठो ऐसे उँगली कर के बैठो, नाक ऐसे कर के बैठो तो आप कर ही सकते हैं, इसमें क्या विशेष है। कोई कहे एक टाँग उपर कर के बैठो, थोड़ी देर प्रैक्टिस करके आप ये भी कर सकते हैं, कोई कहे घोड़े पे कूद के बैठो तो आप कर सकते हैं, कूद जाओ, थोड़ा सा उपर में हो जाओ तो वो भी हो सकता है। एक साहब है, वो आज कल किसी को फ्लाइंग सिखा रहे हैं, अरे भई क्या आपको पक्षी बनने का है; कोई है एक साहब, वो मेंढ़क जैसे कूदने लगे मैंने कहा, मेंढ़क जैसे क्यों कूदते हैं कहा, मेरे गुरू ने बोला कि अगर आप की कुंडलिनी जागी, तो आप मेंढ़क जैसे कूदेंगे। मैंने कल सांप चढ़ के रेगेंगे। अब आप होने क्या वाले हैं? आप क्या सांप होने वाले हैं, कि मेंढ़क होने वाले हैं कि पक्षी होने वाले हैं; आपको कूदने की क्या ज़रूरत है, चिल्लाने की क्या ज़रूरत है और चीखने की क्या ज़रूरत है। अगर आप ही के अंदर वो शक्ति बैठी हुई है, तो अपनी कि कोई इज्जत करें। अपने बारे में समझ लॉजिए कि यह परमात्मा ने पूर्ण सुन्दर्ता से रचाया हुआ मानव शरीर है, बड़ी नाजुक उसकी कलाकृति है और उस कलाक्रती में बड़ी ही सुंदर्ता से उसने कुंडलिनी को ऐसे जगह बिठाया है कि कोई उसको छू नहीं सकता। त्रिकोणाकार अस्थी में बिठाया। त्रिकोणाकार अस्थी को, आपको आश्चर्य होगा कि आप जला नहीं सकते हैं। अस्थी को भी नहीं जला सकते हैं, चाहे उसमें से कुंडलिनी चली जाए आप उसे भस्म नहीं कर सकते हैं; और अगर वो भस्म हो भी जाए बड़ी मुश्किल से इलेक्ट्रोलिसिस वगैहरा से भस्म कर भी दें, तो भी उसकी एक परमाणु एक अलग तरह के होते हैं। इसका नाम ही सेकरम है; देखिये उस जमाने के लोगों ने उस जमाने लैटिन भाषा में इतने पुराने जमाने में उन्होंने इसे सेकरम कहा, ग्रीक्स ने इसे सेकरम कहा। इसका मतलब यह है कि यह बहुत अत्यंत पवित्र चीज है; इसका हिसाब, इसकी कल्पना उस जमाने में भी लोगों को वहाँ पर ग्रीक्स जैसे देश में हुई थी। इसमें परमात्मा ने इस कुंडलिनी का स्थान बनाया है, इतनी सुन्दर रचना है। आखिर क्यों? आप ये भी कहें कि मा क्या ज़रूरी है जैसे हमको अमीबा बना दिया हमें भगवान भी बना देते! हमें आत्मा भी बना देते हैं लेकिन अमीबा से इंसान बनने तक आपकी चेतना है ये बढ़ती रही है, ये प्रगल्भ होती रही, आप इंसान बन गये!

आप में और जानवर में कितना अंतर है, ये आप नहीं जानते हैं? कभी कभी जानवरों जैसा आप कर सकते हैं, आप चाहें तो बिछु बन जाएं और चाहें तो आप शेर बन जाएं वो दूसरी बात है लेकिन तो भी आपके अंदर और जानवर में अंतर रह जाता है; एक घोड़े को आप किसी गंदे नाली से ले जाएं, ये उसको कुछ नहीं फरक पड़ता, कोई भी इंसान उसे ले जाइए, वो नाक पकड़ लेगा, वो नहीं जा सकता। सुन्दरता जिसके बारे में मैंने कहा है उसका विचार जानवर में नहीं होता है; मनुष्य में होता है हालाँकि उसका भी कभी कभी बड़ा बाह्य होता है और सबसे बड़ी चीज है कि आत्मा के ओर खीच इंसान में हो! इंसान ही आत्मा के ओर खीच कर सकता है, जानवर नहीं। जब आपकी चेतना ऐसी प्रगल्भ हो गई, जब आप विशेष चेतना से जब आप प्लावित हुए या शोभायमान हुए उस चेतना को ही जानना चाहिए कि पर्मात्मा क्या है। अगर जानवर जान जाए कि पर्मात्मा क्या है, उसका क्या लाभ है। मनुष्य की ही चेतना स्वतंत्र रूप से जब पर्मात्मा को पुकारती है, उसका आवाहन करती है, तभी आत्मा का आनन उसकी चेतना में, उसके चित में आलोक होता है, उसको आलोकित करता है, ध्यान करता है। उस आलोक को समझने के लिए मनुष्य की चेतना एक तरफ से बढ़ाई गई।

अब यह है, इसमें से हम बोल रहे हैं, यह कनेक्टेड है, सब चीज ठीक ही है लेकिन क्या ये चीज जानती है कि हम क्या हैं, यह हम क्या बोल रहे हैं। समझ लीजिए, इसी चीज को बढ़ाते बढ़ाते इंसान बना दिया और फिर वो चीज, चोकि इंसान है, परमात्मा से संबंधित हो जाए तो वो जान जाएगा कि परमात्मा क्या चीज़ है। इसी लिए आपके अंदर, मानव के अंदर उनकी स्वतंत्रता में, पूर्णतया आपकी स्वतंत्रता में ही यह घटना घटित होती है। आपको मिस्मराइज करके या बेकार के बकवास करके नहीं होती। समझ लीजिए, मैंने कितने भी भाषण दिये, क्या फायदा? आपको किताब पढ़ने से भी क्या फायदा; जब तक आप पार नहीं हुए, आपको भी मुझे मानना नहीं चाहिए। हमारे सहज योग में जब तक आप पार नहीं होते, तब तक मेरे पैर पे आने की आज्ञा नहीं है। क्यों आप मेरे सामने सर झूकाएं! जब तक आप पार नहीं होयेगे, पार के सिवाय कुछ आपके अंदर श्रद्धा नहीं रहेगी। अंदर श्रद्धा के बिना आगे आ जाने से कुछ फायदा नहीं होने वाला। जिस श्रद्धा में पूर्ण तया प्रकाश है, वो ही असली श्रद्धा है। इसलिए दो शब्द होते हैं श्रद्धा और अंध श्रद्धा। नहीं तो चले भेड़ बकरी की तरह, हजारों आदमी जा रहे हैं, तो हम भी चले जा रहे हैं। एक बार एक पिता ने अपने बच्चों से बताया, कि जहाँ सब लोग जाते हैं, वही जाना ठीक होता है। तो लड़के जब बड़े हुए, अकल के कम थें, तो उन्होंने देखा, बहुत से लोग एक तरफ जा रहे हैं, तो चलो, उसके साथ निकल पड़े, वो लोग जा रहे थे शमसान।

इसी प्रकार, मनुष्य को यह समझना चाहिए, कि हमारे अंदर कोई सारा सार बुद्धी होनी चाहिए, डिस्क्रीशन होना चाहिए जिस मनुष्य के अंदर डिस्क्रीशन नहीं है, उसके लिए सहज योग क्या करेगा, बताईंये। यह उसको समझना चाहिए, कि असल क्या है और नकल क्या है। आपको नकल चाहिए कि असल चाहिए, पहली बात। क्योंकि नकल का तो कोई अर्थ निकलने नहीं वाला, थोड़े दिन में आप फेक ही दीजेयेगा उसको। जितने भी नकल होते हैं, आप देखिए उनका सबका बंटाधार हो ही रहा है, एक के बाद एक का पता हो रहा है, तो उन्होंने उसका खून कर दिया, वहां उनको मारा गया, वो वहां से भागे गए, दस फैमिली रूइन हो गई, यह खराबी हो गई, वो खराबी हो गई, क्योंकि जो कुछ भी नकल चीज बनेगी परमात्मा के नाम पर, वो विध्वंसक होगी, वो खत्म कर देगी आपको, और जो परमात्मा के नाम पर असल होगा, वो कंस्ट्रक्टिव होगा, वो आपको बनाएगा, पनपाएगा, बढ़ाएगा। इसलिए, मनुष्य को पहले यह तय कर लेना चाहिए, कि आपको असल चाहिए, कि नकल चाहिए। सोना तो हमको असली चाहिए, तो कलकत्ते में आप जाइये, तो वहाँ असली सोने, चांदी का दुकान मिलता है। सोने के मामले में बहुत हम लोग पर्टिकुलर हैं, असली चोल, और परमात्मा के बारे में, सारे, जिनकी ऐसी भ्रांतियाँ हैं, उनके लिए सहज योग नहीं है, सहज योग असली वीरों का काम है, फालतू बेकार लोगों के लिए सहज योग नहीं है, वो आप चाहे कहें कि मिनिस्टर हो, नहीं तो प्रेसिडेंट हो, नहीं तो कुछ हो, असली वीरों का काम है, जो असली वीर है, वो सामने आए, और बेकार लोगों के लिए सहजयोग नहीं है, आप ही बताये कि आपके आगे टूटे फूटे, बहुत सारे अगर दिये पड़े हो, टूप्स पड़े हैं, आप उसकी रिपेयरिंग करते हैं क्या? उसी दीपक की रिपेयरिंग होती है, और उसी दीपक को अच्छा बनाया जाता है, जिसके अंदर दीप ठहर जाय, क्योंकि यहाँ पैसा चलता नहीं, और कोई चीज चलती नहीं, चलता क्या है? ठहरना, ठाहरावा, इसे मराठी में कहते हैं बैठक, बहुत से लोग सहजयोग में पार हो जाते हैं, यहाँ बंबई में कम से कम पंद्रह हजार आदमी पार हैं, पंद्रह हजार, लेकिन जमें और व्रक्ष हुए ऐसे कितने हैं, ज्यादा से ज्यादा हजार कहीं, जो जम गए और उसके व्रक्ष हुए, जिन्होंने मास्टरी कर ली है, ऐसे हजार से ज्यादा नहीं है, बाकी तो कचर ही हो जाएंगे न, उनका क्या होने वाला है, आज ही एक देवी जी थीं, माता जी मेरे को तो आपने पार करा दिया, अब मेरे यहां दर्द हो रहा है, और मेरे फलाना हो रहा है, ढिकाना हो रहा है, ग्यारह साल पहले पार किया था, तो अब क्या, अब ऐसी हालत हो रही है, मेरे वायबरेशन छूट गए, अब मेरा कुछ होता ही नहीं; पार होने के बाद किया क्या, अंकूर जब आपका जीवन्त हो जाता है, तब उसको कितना पनपाना पड़ता है, आप जानते हैं, कितना संजो के रखना पड़ता है, कितना संभाल के रखना पड़ता है, उसको किस तरह से जतन से बढ़ाना पड़ता है। वो जतन, वो प्यार, वो समझ, आप में होना जरूरी है; आज यहां भी बहुत से सहजयोगी बैठे हैं, उनमें से कुछ बहुत पहले आये थे, कुछ हमेशा के हैं, और कुछ युही, और कुछ नये लोग भी हैं, सब लोगों से एक ही कहना है मुझे, सहजयोग आपको दूसरे किनारे पहुचा देता है, आप दूसरे हो जाते हैं, आप अपनी आत्मा हो जाते हैं, आप अपना ईगो नहीं रहे, आप अपनी आत्मा हो जाते हैं, पर अपनी अवस्था जो है, उसको बनाना पड़ता है, उस चीज पर आपको जमना पड़ता है।

इस मामले में मैं यह कहूँगी, कि इंग्लेंड के जो लोग हैं, आश्चर्य की बात है, बड़ी आश्चर्य की बात है कि इंग्लेंड के लोग, जिन्होंने एक जमाने में यहाँ इतना सत्ता दिखाई, यह इंग्लेंड के लोग बड़े जोर से पैठ गए, खोजा ही नहीं, पैठ भी गए, और हम, जिनके लिए हजारों अवतारों ने यहाँ जन्म लिया, इस पुन्य भूमी को विशेष कर, इतना पवित्र बनाया, इसके रग-रग में चैतन्य की लहरे बहर रही हैं, उस देश के लोगों में वो गहराई और वो गहनता नहीं है। बड़ा आश्चर्य होता है, मैं स्वयं बड़े आश्चर्य में हूँ। मैंने तो इसलिए भारत वर्ष में जन्म लिया और महाराष्ट्र में विशेषकर के कि यह पुण्य भूमि है, यह संतों की भूमि है। अब साहब हो गए महाराष्ट्रीयन लोग भी। जिस दिन महाराष्ट्रीयन लोग साहब हो गए, तो गया आपका देश, समझ लीजिए। जिस दिन यह हो गया, तो गये आप तो। सारी धूरी मतलब गणपती चूल्हे में गए, सब मंदिर, मंदिर बंद करा दीजिये, गणपती जितने भी आपके हैं, अश्टविनायक, उनके ताले लगा दीजिए। और बुद्धीवादियों ने अपने दिमाग से ऐसी, ऐसी चीज़ें निकाल के रखी हुई, कि आप उस भरमार में आओ. अब फ्राइट का जमान आने वाला है, महाराक्षस है वो, उसने उन देशों को खत्म कर दिया, लेकिन वो संभल गए, और तुम लोग नहीं संभलोगे, क्योंकि अंग्रेजों ने उसे लिया, तो हमें लेना चाहिए, उन्होंने गलत काम किया, तो हमको गलत काम करना ही चाहिए, ये सोच करके, हमने सब कुछ अपना जो भी था, उसे खो दिया।

फिर आजकल नए नए गुरू भी निकल आए, बातें बनाने के लिए, सबका खंडन करने के लिए, कोई कृष्ण बनता है, तो कोई कुछ बनता है, कोई कुछ बनता है, कुछ बनने से नहीं होता है। कृष्ण थे, उनकी संहार शक्ती कोई दिखा दे, तो माना जाए, एक वहाँ आये, कहा, मैं कृष्ण हूँ, मैंने कहा, अच्छा जरा पानी पे चल के दिखाओ। कृष्ण जो शाक्षात ब्रह्म स्वरूप थे, वो बन के वहाँ पहुंचे, मेरे सामने मैं कृष्ण हूँ, और थर थर थर थर मेरे आगे, ऐसा ऐसा, उनका बदन हो रहा है, सारा बदन लट लट लट कंप रहा, बड़े कृष्ण बन के आए, और उनके बहुत फॉलोइंग है, वो बोलते हैं ना, बड़ी सी उन्होंने कृष्ण जैसी दाढ़ी रख ली, और अपने को अस्थी पंजर बना के घुमते हैं, मैंने कहा पहले कृष्ण तो अस्थी पंजर थे ही नहीं, बेवकूफ कहीं के। कृष्ण अगर अस्थी पंजर होते हैं, तो इतना बड़ा क्या क्रॉस उठा के ले जाते क्या? उसको अस्थी पंजर तुमने इसलिए बनाया, क्योंकि तुमसे देखा नहीं गया, उनकी तंद्रुस्ती को, और तुम चाहते कि ऐसा दिखाए, कि जो बिल्कुल मरगिल्ला क्रिस्ता था, और सब दुनिया कहे कि काहे को क्रिस्ट होने का, हम भी मरगिल्ले हो जाएं। आज ही इन्होंने कह दिया, लेकिन क्रिस्ट का ये क्या? जिसको कहते हैं राज, क्या उनकी तंद्रुस्ती थी, तबियत थी, शक्ल थी, और एक तेजस्विता मूँह पे हमेशा झलकती रहती थी। क्या आप ही सोचिए, जिस आदमी ने सारे संसार का आकार, स्वरूप अपने को बनाया, वो इस तरह का होगा, इस तरह का उसका चित्रण बना के रख दिया। इसी प्रकार हर तरह के अवतरण, हर तरह के ऊंची चीज़े, जितना भी नोबलर लाइफ में था, सब को गिरा के रख दिया। और हम लोग भी बेवकूफ जैसे इन लोगों को मानते हैं। कल एक ने मेरे से पूछा कि इसके क्या लक्षण हैं, कैसे पहचानना चाहिए? कौन आदमी सच्चा है और झूठा है?

सर्वप्रथम कोई आदमी इसका पैसा ले और ऑर्गनाईज़ेशन करें, वो महा झूठा है, विलंदर है। ऐसे आदमी दर्वाजे कभी नहीं जाना है, चाहे वो ब्रामण हो, अपने को कहलाये, चाहे वो पोप कहलाये, और चाहे कोई गुरु बन के बैठे। दूसरों के दम पे जो मोटरे उड़ाता है, और बड़ी बड़ी थालियों में खाना खाता है, और शराब पीता है, ऐसा आदमी कभी भी अवतार नहीं हो सकता है, सारे अवतारों ने आपके लिए कष्ट सहन किये हैं, सारे साधू संतों ने आज तक कष्ट सहन किये हैं, जितने साधू संत हैं, सबको आपने कष्ट दिया है, कष्ट ही नहीं दिया, महा यातनायें आप लोगों ने दी हैं।

ईसा ने कहा है, इसको तो मैं माफ कर दूँगा, जिसने भी मुझे सताया, those who have not recognized Me, I will forgive them, all that can be forgiven, but not against the Holy Spirit. आदि शक्ति के किसी ने सताया, तो खबरदार है, लेकिन आदि शक्ति को सताने वाला अभी पैदा नहीं हुआ, ईसा को भी सताने वाला कोई पैदा नहीं हुआ था, वो तो उन्होंने नाटक खेला था, क्योंकि लोग बेवकूफ थे।

अब अपनी आँखें खोलने की ज़रूरत है और समझने की ज़रूरत है, आप लोग जिसे खोज रहे हैं वो खजाना आपके अंदर है; आप ही के अंदर रमण कर रहा है, उसको पाईये। उसको पाना ही सबसे बड़ी आपकी चीज है और अगर हम आपकी असल में माँ हैं तो हम वही चाहेंगे कि जो असल है वो आपको देंगे, आपकी माँ आपको नकल कभी देगी? जब आपकी माँ नहीं देगी तो हम कैसे देंगे, लेकिन अगर चाहें कि हम आपका अहंकार कहें भई तुम बड़े पहुंचे हुए आदमी हो, तुम बहुत बढ़िया आदमी हो, ऐसे झूठे अहंकार को बढ़ावा नहीं देने वाले कि बाद में आपने देखा कि एक सर में से बलून चला आ रहा है और उसमें से एक सींग निकला चला आ रहा है और आप जिसको देखते हैं उसी को अपने सींग से उड़ा रहे हैं। जो सत्य है उसको मानना अच्छा है, सत्य मानना कठिन है, असत्य को मानना बहुत आसान है; तभी जितने ढोंगी और झूठे लोग हैं वो पनपते हैं और सत्य को मानना इतना कठिन है मनुष्य के लिए; ना ही यह है कि सत्य सुंदर नहीं होता, सत्य अत्यंत सुंदर होता है, इतना बहुमूल्य चीज है, इतनी आनंद दाई चीज है लेकिन मनुष्य इस लिए उसे नहीं मानता है कि वो अपने अहंकार में लिपटा है, उसको लगता है अहंकार ही मेरा सुख है; दो चार कपड़े ऐसे पहनने को मिल गए, उसको शान चढ़ जाती है, अच्छी देखा मोटर में चला तो उसकी आँखें बदल जाती हैं कहीं मिनिस्टर हो गया, तो फिर क्या कहने हैं, उसको टाइम नहीं रहता किसी चीज के लिए।

अहंकार को जो बलवान बनाए वो चीज मनुष्य ढूँढता है, लेकिन ये सिर्फ क्षणिक सुख है, क्षणिक, असली आनंद जिसे कहते हैं, जिसमें दुख हर सुख नहीं होता सिर्फ आनंद ही आनंद मात्र होता है जैसे वेणु गोपालन ने अभी बताया आपको ये सिर्फ जिसे ब्लिश कहते हैं वो आत्मा का सुख है। आत्मा को पाईये, अपने अहंकार को मत पाईये; अहंकार आपका चित जो है विचलित रखेगा। आपको कंफ्यूजन में डालेगा अहंकार से तो सबसे बड़ी चीज़ होती है गधा पंथिपना, स्टुपिडिटी जैसे कहते हैं। एक से अहंकारी मैंने देखते हैं, उनको देखते साथ समझ नहीं आता है, हंसें की क्या करें, ऐसी बेवकुफी की बात करते हैं और अहंकार में वो यह जानते हैं कि हम बेवकुफ हैं। कबीर कहते थे 'पढ़ी पढ़ी पंडित मूरख भए'।

जितने भी राक्षस हैं महा अहंकारी थे, अब कल जुग में उन्होंने चोगे पहन लिए हैं और अहंकार ऊपर से नहीं दिखाते हैं, लेकिन अंदर से महा अहंकारी हैं और आप सब को खा जाएं। आप जैसे कोई नया पनपा हुआ पौधा होता है, उसी प्रकार अत्यंत अप्राकृतिक हैं; कोई हवा आ जाएं, उसमें आप बहक जाते हैं। इसमें आपका भी दोष नहीं है, लेकिन समझ रखना चाहिए परमात्मा ने आपको बुद्धि दी है, उसको इस्तेमाल करना चाहिए और पहचानना चाहिए कि असल क्या है और नकल क्या है।

अब कुंडलिनी हमारे अंदर है, वो जागती है, वही आपको अपना आत्म साक्षात कर देती है जिससे आपका पुनर्जन्म होता है; जिसके बारे में अनेकों ने सारी किताबों में यही लिखा हुआ है कि अपने अंदर खोजो, अपने अंदर पाओ, अपने ही अंदर है। लेकिन कैसे, यह जीवंत क्रिया है। माने एक फूल फल होता है कैसे, एक बीज उगता है कैसे? एक पेड़ बनता है कैसे, सब जीवंत क्रियाएँ हैं, सब परमात्मा करते हैं; उसी प्रकार आप भी अपना आत्मसाक्षातकार प्राप्त करते हैं। जिस जिस तरह से एक बागबान बीज को माँ के उदर में रख के पनपाता है, उसी प्रकार हम भी कुछ करते हैं, बस इससे ज्यादा कुछ हमारा आपका लेना देना कुछ भी नहीं है, आपका अपना है आप ले लीजिए। लेकिन उसका संगोपन, उसका संभालना, उसका बढ़ाना इतना ज़रूर हम आपको सिखाते हैं। अभी वेणु गोपालन साहब ने कहा कि माँ से प्यार करना चाहिए; करो तो भला, नहीं करो तो माँ तो नहीं छोड़ने वाली, वो तो प्यार करती ही है। लेकिन आप अगर प्यार करें तो उसका मज़ा उठा सकते हैं। हम तो प्यार करेंगे ही चाहें आपको हमें मारिये, पीटिये, चिल्लाईए, चीखिये, हम तो करेंगे ही क्योंकि आप हमारे बेटे हैं, लेकिन आपका अपने मामले में क्या ख्याल है? आप भी तो अपने को प्यार करें, आप भी अपना थोड़ा विचार करें, आप भी अपने को जानें और अपने आनन्द में डूबें। हर एक तरह का एक्स्ट्रीम जो है उसे छोड़ देना चाहिए, किसी भी तरह का एक्स्ट्रीम जो है, वो आपको मध्य से हटाता है। कुंडलिनी जो है, वो मध्यगा है, बीच में जाने वाली है; कोई भी एक्स्ट्रीम चीज, जैसे एक एक्स्ट्रीम साधारण तरह से लोग समझते हैं कि आप अगर नन बन जाईये, या सन्यासी बन जाईये और जंगलों में जाके आप सर के बल खड़े होईए, तो आपको परमात्मा में मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा। या दूसरा आदमी है, वो सोचेगा जिसमें कुछ नहीं रखा, सब छोड़ो शराब पीयो या विचार करो, दुनिया भर की गंदगी करो, सो तो परमात्मा कभी ऐसे आदमी को नहीं मिलने वाला। इसके मध्य में रहना है, सर्व साधारण की तरह से। विवाहित रूप से अपने शरीर का भी उपयोग एक पूज्यनिय तरीके से होना चाहिए, जो शुभ बताया गया है, वो करना चाहिए; जितना अशुभ है, उसका त्याग करके अगर मनुष्य रहे, उसका पार होना बिल्कुल मुश्किल नहीं है। एक तो उसके अंदर अंतरिक इच्छा होनी चाहिए और दूसरे किसी भी एक्स्ट्रीम्स तक उसे नहीं जाना चाहिए।

किसी भी एक्स्ट्रीम्स पर आदमी चला गया तो मालूम है आपको शारीरिक तरह से क्या हो सकता है; अब तो डॉक्टरों ने भी कह दिया है कि कैंसर की बीमारी जो है वो इस कारण होती है कि हमारे शरीर में ऐसी कुछ एरियाज हैं, कुछ ऐसे प्रांत हैं कि जिनमें कुछ प्रोटीन हैं। इनका उन्होंने नाम प्रोटीन 58 और इस तरह से नाम दिया हुआ है; जब से सृष्टि बनी है, क्रियेशन के समय से अभी तक उस प्रांत में ऐसे प्रोटीन अब भी जीवंत हैं। जब ये प्रोटीन हमारे अंदर अटैक करते हैं तो तभी कैंसर होता है, कैंसर जो है वो शुरू हो जाता है, ट्रिगर हो जाता है; अब तो निर्विवाद डॉक्टर ने ये बात कह दी है और ये हम दस साल से कह रहे हैं कि आपने एक्स्ट्रीम्स पर कोई भी कोशिश की, मैस्मरिज्म ही चीज़ ले लीजिए या किसी गुरु के चक्कर ही लीजिए, यह आप एक्स्ट्रीम्स पर चले गए और आपके अटैक आएगा ल्यूकेमिया और कैंसर; और दुनिया भर की बीमारियाँ भी एक्स्ट्रीम्स से होती है अधिकतर।

एक छोटी सी बात है, मनुष्य बहुत सेंसिटिव है, लोग उसे दुख देते हैं किसी न किसी वजह से; कोई बहुत शरीफ आदमी होता है तो उसे लोग दुख देते हैं और वो उस दुख को सहते रहता है, उससे भी उसे बीमारी हो सकती हैं; सहने की कौन सी बात है, किसी ने कुछ कह दिया उससे कहना चाहिए कि आप चुप रहें, उससे बात कहने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि आप स्वयं साक्षात आत्मा हैं, किसी से अपमान सहने करने की भी ज़रूरत नहीं और किसी का अपमान करने की भी जरूरत नहीं, किसी से लड़ने की भी जरूरत नहीं और किसी के अपने ऊपर आक्रमण करवाने की भी जरूरत नहीं। दोनों ही चीज़ एक होगी, आप बीच में खड़े हुए सीना तान के खड़े हो जाइए, ना किसी पे आप आक्रमक होइए और नहीं किसी से अपने ऊपर आक्रमण होने दीजिए। लेकिन कुंडलिनी योग जब घटित होता है तब यह स्वयं ही हो जाता है, कुछ कहना नहीं पड़ता। जैसे मैं किसी से यह नहीं कहती हूँ कि तुम शराब मत पियो या कुछ मत करो, क्योंकि आज का कुंडलिनी योग एक महायोग स्वरूप हो गया है। यह महान प्रेम और करुणा है कि किसी भी तरह का आदमी आ जाय, पार हो जाता है; मैं स्वयं आश्चर्य में पड़ जाती हूँ। लोग हैं लंदन में, आप देखिए शराब पीते हैं, उनके गणपती खराब हैं, उनको सेक्स की आइडिया नहीं, कुछ नहीं, पार हो गये, शराब छूट गई, उनके ड्रग्स छूट गए, एकदम सुंदर हो गए, शक्ल देखिए कि एकदम सीधे क्योंकि एकदम लगते थे कि कहां से यह आये हैं, क्या इनकी दशा है, जो मुझे देख भी नहीं सकते थे, आंख खोल कर कोमा कंडिशन्स में आए। सिरोसिस लिवर ठीक, ल्यूकेमिया ठीक, इतना डाइनमिक इसे कहते हैं प्रचंड प्रेम।

लेकिन शंका कुशंका करना और अपने को बड़े महान समझ करके आना सहजयोग आपको उठा के फेक देगा। ऐसा समंदर एक उठाकर वहाँ फेक देगा, फिर आप आएंगे नहीं महीनों, ये भी दूसरी बात है। आप अपने को बहुत समझते हैं तो जाइए, आपको उठाके फेक देगा; मैं तो आश्चर्य करती हूँ, मैं कोशिश भी करूं तो भी नहीं आएगा, वो आदमी पार नहीं हो पाएगा, भाग जाएगा कुछ ऐसे चक्कर में आ जायेगा कि चला जाएगा, अहंकार का कोई स्थान सहजयोग में नहीं है; आप अगर बहुत विद्वान हैं तो अपने घर में बैठिये। आपने जाना है तो आप घर में बैठिये, अगर जानना है तो पहले आत्मा को पाइए। रही हमारी बात, हम तो माँ हैं, अब हम तो हमेशा सेवा में लगे रहेंगे और कोशिश करेंगे कि आपके अंदर सुबुद्धी आए, आप अपने से प्रेम करें और समझें आप क्या हैं कि आप अनन्तकाल के एक खोजने वाले हैं। आपकी श्रेणियों में उस श्रेणी को आप पहचानें कि हम एक विशेष रूप क्या हैं। अभी अभी मुझे एक किताब किसी ने पढ़ने को दी जो विलियम ब्लेक ने लिखी, जिसका शीर्षक मिल्टन है। इसमें विलियम ब्लेक ने मिल्टन कवी को एक खोजी की करके सिम्बल में लिया हुआ है और पूरा की पूरा सहजयोग उसमें वर्णित किया है और कहा है कि इंग्लैंड जो है वो जेेरूसेलम होने वाला है, यह एक स्थान है।

हमारे एक मुसलमान शिष्य हैं, अल्जीरिया में रहते हैं, उनकी माँ ने कहा कि हमें मक्का जाने का है हज के लिए पैसे दे दो। कहा, ना, आज का मक्का जो है, लंदन है, लंदन जाओ; ढाई सौ मुसलमान वहाँ पार कराये। यह जितनी भी धार्मिक घुटन है, यह धर्म नहीं है, यह धर्म के विरोध, प्रेम के विरोध में खड़े हुए राक्षस हैं, जिसको हम सनेटिसिज्म कहते हैं; मेरा धर्म, मेरा धर्म कहने वालों से पूछें कि धर्म क्या चीज़ है, किसी को कुछ मालूम नहीं। उनकी सारी दिवारे धड़ धड़ गिर जाएंगी। अल्जीरिया में इन्होंने हमसे बताया कि रोजे के दिन सब लोग वहाँ भूखे रहते हैं और सब तरह के धंधे करेंगे, रोजे के दिन भूखे रहने से क्या मिलने वाला है। सब तरह के धंधे करते हैं, शराब पीना, दुनियाँ भर की, औरतों के झंझट सब वहाँ शुरू हो गया है, सिर्फ रोजा जरूर रखेंगे। रोजे के पहले दिन हंसें की रोए। पता नहीं चलता है यह पहुंचे जब, जिस मस्जिद में जाने वाले थे, सारी कि सारी मस्जिद ही धड़ से अंदर चली गई। देखिए, यह मस्जिद कैसे अंदर चली गई? अरे मस्जिद भी क्या है? और मंदिर भी क्या है? सिर्फ पत्थर तो हैं न, जिसके अंदर भगवान ही नहीं वो मंदिर और मंदिर कुछ नहीं बचने वाले और वो मनुष्य भी नहीं बचने वाला, जिसके आत्मा की जागृति नहीं हुई। वो भी दिन आने वाले हैं, इसलिए अपने आत्मा की जागृति कर लीजिए।

मैं आपकी मां हूँ, मैं आपसे विनती करती हूँ ... अपने को पहचानिए, अपने को समझिए, अपने अहंकार में मत पड़िए, अपने आत्मा की जागृति करके अपना परम कल्याण साधिए, अपने परम तत्व को और साधिए। सब बेकार की बातें हम यह हैं और हम वो हैं, हम इस चाकी और पंथ और धर्म के हैं, यह सब झूठ है, आप सिर्फ परमात्मा के पंथ के हैं और यह जिन जिन के आप नाम ले रहे हैं बुद्ध, महावीर, आदि, जिसका भी आप नाम लें मोहम्मद साहब का, सब हमारे साथी हैं, इन पाखंडियों के नहीं, इन चोरों के नहीं जो उनके नाम पर बड़े बड़े संगठन निकाल करके और पैसा बना रहे हैं; वो हमारे साथी हैं, वो हमारे रिश्तेदार हैं, इसलिए आप उस रास्ते पर आईए जहां पर यह असली लोग खड़े हुए हैं।

इनके फूल तोड़ तोड़ करके अपने को लगा लिये हैं और कहते हैं कि हम इस धर्म के हैं, हम उस धर्म के हैं और धार्मिकता उनसे इतनी ही दूर है जितनी कि गंदगी से सुगंध। अपने अपने सुगंध को पाए, अपने अपने आनंद को लूटें, अपने अपने समुद्र में जायें और इसकी सारी व्यवस्था आपके अंदर बनी हुई है, सिर्फ अपने अहंकार को ज़रा सा नीचे कर लें, थोड़ा सा, उसको भी लड़ने की ज़रूरत नहीं, बल्कि कुंडलिनी स्वयं साक्षात उसे कर लेती हैं लेकिन थोड़ी तैयारी चाहिए।

अब आप में कोई-कोई विद्वान बड़े मुझे नज़र आ रहे हैं, बहुत पढ़े लिखे विद्वान; किताबें ज़रा समुद्र में फेंक आइए, बिलकुल व्यर्थ हैं। किताब के पढ़ने से कुछ नहीं होने वाला, सर्व साधारण लोग जो कि दिहातों में रहते हैं वो हमारा असली काम होता है। बंबई में तो यही हाल है, असली काम हमारा देहातों में होता है; अभी एक देहात से आएं हजारों लोग यहां पार हो रहे हैं, शहरों के लोग रह जाएंगे अधकच्चे क्योंकि वो अपने को समझते नहीं हैं, वो क्या हैं। क्योंकि शहरों के लिए तो गुरु लोग तैयार हैं आपकी जेबें खाली करने के लिए। हमारे लिए तो गाँव में ही, गाँव में ही परमात्मा है। आप लोग भी अपना थोड़ा अहंकार छोड़ें और ये समझ लें कि जब तक परमात्मा को पाये नहीं, तो हम किस काम के। हमारा क्या अर्थ है, बेकार ही में अपने को क्यों समझें बैठे, भाई! हालाँकि एक बात जरूर है जिससे अहंकार न बलवत हो कि आप लोग बहुत बड़े परमात्मा को खोजने वाले साधू संत हैं और इसके बारे में भविष्यवाणी हुई थी कि घोर कल युग में ही ये होगा, ये घटना घटित होगी, महा योग स्थापित होगा और महा योग ही आपका, इसे लास्ट जज्मेंट कहते हैं, वही है कुंडलिनी के जागरण से ही आपका जज्मेंट होता है और कोई तरीका इसका नहीं।

आज का प्रोग्राम हालाँकि अभी आखिरी है, फिर से मैं आने वाली हूँ। सहजयोग में लग के रहना है, तब उसका पूर्ण आशीर्वाद आपको मिलता है। कृष्ण ने भी कहा है, कि योग क्षेम व्हाम्यहम। पहले योग होगा फिर कहें क्षेम होगा। योग के बगैर क्षेम नहीं होने वाला। योग होते ही साथ क्षेम की कल्पना भी बदल जाती है और क्षेम घटित भी। पहले आप योग को अपना पाएँ, अपने आप क्षेम घटित होगा।

यहाँ ऐसे बहुत से लोग हैं जो बताएँगे कि सहज योग से कैसे-कैसे क्षेम प्राप्त हुए। सभी को लाभ हुआ है और आपको भी लाभ होगा; इस परमात्मा ने अपना ही द्वार आपके लिए खोल दिया है। वो क्या आपको ये शुल्क और छोटी चीज़ें नहीं देगा लेकिन आपके सारे ही प्राथमिकता, जिसको कहते हैं, सारे ही मूल्यांकन बदल जाते हैं और आप एक दूसरे ही हो जाते हैं; वही आप हो जाएं, उसमें जमें और रमें। और इस बंबई में कोई तो भी विशेष कार्य करें, ऐसा मैं चाहती हूँ, हर जगह बंबई में सेंटर्स हैं और भारती विद्या भवन में भी एक सेंटर है। ये लोग चलाते हैं, जिन लोगों को सुविधा यहाँ नहीं रहती है वो यहाँ आएं लेकिन आना पड़ेगा, सामूहिकता ही इसका ये है। सहज योग मानें सामूहिकता, सामूहिकता जागरूक करना यही सहज योग का मुख्य लक्षण है। आपके अंदर सामूहिकता आ जाती है, आपके उंगलियों में आप पता लगा सकते हैं कि आपके चक्र का क्या अंदाज है और दूसरे के चक्र कहां पकड़े हैं। आप सामूहिक हो जाते हैं। लेक्चर से नहीं, 'You are brothers and sisters' यह नहीं, 'You become, become' अपने-आप आप महसूस करें, दूसरे को आप अपने अंदर महसूस करें लग जाते हैं; यह विराट का एक अंग प्रत्यंग आप होते हुए भी जागृत हो जाते हैं और आप उसे महसूस करने लग जाते हैं अपने अंदर, यह होना होता है। जब तक यह घटना घटित नहीं होगी तब तक लेक्चर देने से आप किसी के भाई बहन नहीं हो सकते हैं। आपको यह महसूस नहीं होगी, यह घटना है, यह घटित होनी पड़ती है और यह फ्रिवलस लोगों के लिए नहीं है। फिर से मैं कह रही हूँ, जो लोग फ्रिवलस हैं, जो लोग ऐसे ही अब चार जगह गए, अभी लेक्चर में चलो टाइम है माता जी को भी सुन लिया, फिर चले; यह कोई दुकान नहीं है और कोई बाजार नहीं है। इसमें जमना पड़ता है और जो जमता है, वही पूरी तरह से पाएगा। परमात्मा आपको सुखी रखे!

एक आध दो प्रश्न हो तो पूछिए, कोई हर्ज नहीं है, लेकिन बेकार के बकवास प्रश्न जो पूछे तो मैं बहुत ज्यादा होशियार हूँ। नहीं नहीं, कोई बाधा है क्या? तो आप मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। कुछ खास दूर से नहीं आए, इससे भी दूर से लोग आते हैं। समझे ना आप, लेकिन आप मेरे ऊपर छोड़ तो दो! हाँ! बस छोड़ दीजिए!

दूसरा प्रश्न अच्छा है! क्या लक्षण होता है, कैसे पहचानना चाहिए कि जागृति हुई कि नहीं? लक्षण ऐसा है कि जब जागृति होती है कुंडलिनी की तो जिस तरह का आपका मध्यमार्ग होगा उस प्रकार उसके लक्षण शुरू में दिखाई देंगे, जैसे किसी की अगर नाभी चक्र पकड़ा हो, माने जो चीज़ है वास्तविक वो देखनी चाहिए। अगर आपके नाभी चक्र की पकड़ है समझ लीजिए तो आपकी कुंडली नहीं तो त्रिकोणाकार अस्थी में ही स्पंदित रहेगी, बहुत-बहुत देर तक उठेगी नहीं पर स्पंदन होगा, आप आंख से देख सकते हैं। अगर आपका नाभी चक्र आदि ठीक है आप मध्य मार्ग के आदमी हैं, किसी गुरु की अभी तक आपके ऊपर कृपा, माने अवक कृपा नहीं हुई है तो कुंडलिनी सताख से ऊपर चढ़ सकती है, अगर आप बहुत ज़्यादा बुद्धिवादी हैं, बहुत ज़्यादा विचार करते हैं। आज्ञा पर रुकने पर आपके आंखों में डाईलेटेशन हो सकती, हो जाएगी। आपकी आँख डाईलेट करेंगी, इसलिए आँख बंद करने को कहते हैं; मैस्मरिज्म में आख खोलने को कहते हैं। आँख बंद करके बैठना। अगर आपका सहस्त्रार बहुत ठीक है तो एकदम यहाँ से आपको ठंडी हवा आने लग जाएगी, आपको लगेगा जैसे कोई कूलर खुल गया आपके अंदर से ठंडी आने लग जाएगी। अगर आपके शरीर में कोई ऐसी चीज़ हो जैसे कि जिगर, याने जिसको लिवर कहते हैं, वो खराब हो या कुछ हो तो आपके अंदर से गरम गरम हवा आने लग जाएगी; कुछ बीमारी होगी तो पहले गरम गरम हवा आएगी, आपके अंदर से यहाँ आने लग जाएगी, फिर धीरे-धीरे वो ठंडी हो जाएगी और बहुत से लोगों के पहले ही इसमें हाथ में ठंड आने लग जाएगी। यह सबसे अच्छा लक्षण है कि हाथ में ठंडी हवा बहनी शुरू हो गई। मैं जब बैठी तो मेरी तरफ से आएगी, पर नहीं तो ऐसे बहना शुरू हो जाएगी; ठंडी हवा यही चैतन्य की लहरी है, जिसको कूल ब्रीज़ ऑफ द होली घोस्ट बाइबल में कहा हुआ है, स्पष्ट रूप से। होली घोस्ट माने आदी शक्ति, वो आपको महसूस होने लगेगी और एकदम निर्विचारित आ जाएगी। आज्ञा चक्र से कुंडलिनी चढ़ते साथ ही निर्विचारित आ जाती है और ब्रह्मरंदर भेदने पर अगर आपका विशुद्धी चक्र ठीक हो तो आपके हाथ में खूब जोरों से बहना शुरू होता है, पर विशुद्धी के दोष से कभी-कभी यह होता है कि आपको इतना महसूस उंगलियों पर नहीं होता पर यहाँ पर होने लग जाएगा और आपको यह भी पता होगा कि कुंडलिनी चढ़ रही है।

जैसे वेणु गोपालन की विशुद्धी खराब है, यह भी बहुत बेचारे गुरुओं के चक्र में घूम चुके हैं। तो इनको हाथ में इतना महसूस नहीं होता था पहले- पहले पर अंदर कुंडलिनी का चलना फिरना सब महसूस होता था, उसका प्रकाश भी दिखाई देता था इनको करते-करते अब इनके हाथ में भी महसूस होने लगा; तो इसका सबसे बड़ा लक्षण यह है कि आदमी एकदम रिलैक्स हो जाता है और साक्षी स्वरूपत्व आने लग जाता है और हाथ से ठंडी ठंडी लहरे बहने लगती हैं; यह जागृति का लक्षण है।

अब जब यह स्थिति आ जाने पर इसको आपको उपयोग करना चाहिए। अब अगर राजा हो जाए और अपने राजा पना का आप कोई अधिकार नहीं जमाएं तो कौन मानेगा कि आप राजा हैं; फिर आपको दूसरों को देखना चाहिए। उनकी कुंडलिनी जागृत करके देखना चाहिए, दूसरों के वायब्रेशन देखना चाहिए, फिर आपको आश्चर्य होता है कि आपके अंदर कितनी शक्ति है। फिर आपको पूरी तरह से इसका ज्ञान दिया जाएगा और आप उसको परताला करके देखें, सच्ची है या नहीं, पर संशंक नहीं, नम्रता पूर्वक देखें। हाँ भाई, जैसे वहाँ में, लंडन में शुरू-शुरू में एक महाशय थे, उनको पार किया; उन्होंने कहा माँ! यहाँ से बैठे-बैठे सबका पता लग जाएगा, मैंने कहा हाँ, क्यों नहीं, कहने लगे मेरे फादर का फोन नहीं आया बहुत दिन से, स्कॉटलैंड में रहते हैं।

मैने कहा अच्छा! ऐसे दोनों हाथ कर के रखो उनके बारे में, फट से उनके यहाँ पकड़ आ गई, जलने लगी, कहने लग 'ये क्या?' मैंने कहा यह सब फादर के लिए, और यह जो है, विशुद्धि चक्र है। 'He must be down with bronchitis' यह शब्द मैंने अंग्रेजी में कहे। उन्होंने अपने फादर को फोन किया, मदर पे आईं, कहें क्या हाल है, फादर कैसे, कहने लगीं 'फादर इज बैडली डाउन विद ब्रॉनकाइटिस', यही शब्द उन्होंने कहे।

बाद में उन्होंने यह भी सोचा कि हो सकता है माँ ने अपने अंतः शक्ति से जान लिया है, लेकिन मेरी शक्ति से नहीं, मैंने कहा अच्छा! मेरे सामने नहीं, ऐसे भी तुम ट्राइ करो, फिर निर्विवाद हो गए। क्योंकि आपका संबंध परमात्मा से हो जाता है, सारी चीज़ को आप अपने हाथ पर जान सकते हैं, अभी तक आपके पास कोई भी ऐसा एक मेंव ऐबसोल्यूट ज्ञान नहीं है जिससे आप जानें, यह आदमी सच्चा है कि झूठा, यह गुरु सच्चा है कि झूठा है, कैसे जानें? उसके तरफ हाथ करने से ही, उसके बारे में विचार करने से आपको पता हो जाएगा कि यह आदमी कैसा है। ब्रह्म का ज्ञान हो जाता है। यही ब्रह्म है जो बैराग्य है। इसलिए इसको इस्तेमाल किये बगैर, इसको उपयोग किये बगैर आप नहीं समझ सकते कि आप क्या हैं, आपकी क्या अवस्था है; तो पहले तो आपको लक्षण बताए और उसके बाद में यह बताया कि इसको आप किस तरह से अपने अंदर मानते हैं जैसे कोई दवा है, जब आप उसको लेते हैं, उससे फायदा होता है तभी तो नहीं मानते कि यह दवा अच्छी है, किसी डॉक्टर के कहने से नहीं मानने वाले, उसी प्रकार आप खुद ही इसका सर्टिफिकेट खुद ही देने लग जाते हैं।

अब यह इतने जो बैठे हैं, यह सब सहज योग जानते हैं, इनसे सीखो सहज योग। इनसे भी छोटे हमारे एक ग्रैंड डॉटर हैं, वो चार साल की, उनसे भी सीख सकते हो।

मराठी – “कालेंका उगर, कालेंका विचा लोगा, विचाना अच्छा है। एक कारण की विचाला हर कुछ नहीं है, तो भयाला लोगा, आईच्छा है।“

Bharatiya Vidya Bhavan, Mumbai (India)

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