
The International Situation 1989-09-01
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1 सितम्बर 1989
Public Program
मुंबई (भारत)
Talk Language: English | Translation (English to Hindi) - Draft
[एक सहज योगी के अनुरोध के जवाब में दी गई वार्ता। स्थान अज्ञात। संभवतः यूके]
हमारे ग्रह, या धरती माता की स्थिति बहुत ही नाज़ुक है। एक तरफ हम इंसानों के हाथों महान विनाश के संकेत देखते हैं और इसलिए ये हमारा खुद का कृत्य हैं।
विनाश का प्रबल प्रभावशील विचार मनुष्य के अंदर काम कर रहा है, लेकिन यह विनाश बाहर पैदा करता है। जरूरी नहीं की यह विनाशशीलता जानबूझकर है, लेकिन अंधी और बेकाबू है। इसी अंधेपन और अज्ञानता को ज्ञान प्रकाशित कर दूर करना है।
भारत के प्राचीन पुराणों के अनुसार यह आधुनिक समय निश्चित रूप से कलियुग के काले दिन हैं जो बड़े पैमाने पर आत्म-साक्षात्कार या आत्मज्ञान का युग भी हैं।
लेकिन, हमारे पास अभी भी हमारे अतीत या हमारे इतिहास की कई समस्याएं हैं जिन्हें पहले ही सुलझाना होगा। इनका अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, तो पहले देखते हैं कि किस समस्या या किन समस्याओं का समाधान करना है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, हाल के वर्षों में कई मूलभूत समस्याएं रही हैं। विश्व युद्ध के बाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विकास साम्यवाद और लोकतांत्रिक विचार के बीच संघर्ष रहा है। इन राजनीतिक विचारों के स्वरुप और सरकार के बीच एक मौलिक दरार थी, और इसके परिणामस्वरूप पूर्व और पश्चिम के बीच लगातार तनाव बना रहा। यह मानवता के भविष्य के लिए हमारे समय के बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गया।
हाल के वर्षों में, हालांकि, एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ, सबसे पहले चीन में श्री डेंग (देंग जियानपिंग) ने चीनी समाज को नए विचारों के लिए खोलना शुरू किया।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन श्री गोर्बाचेव के विश्व पटल पर आने के साथ आया। जब उन्होंने सत्ता संभाली, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने देश की स्थिति की बहुत गहन समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रूढ़िवादी कम्युनिस्ट सिद्धांत के अनुसार पुराने राजनीतिक और आर्थिक ढांचे को बदलने की जरूरत है और ऐसा परिवर्तन मुलभुत प्रकृति का होना चाहिए।
इसलिए उन्होंने दुनिया को दो नए शब्द दिए, "पेरेस्त्रोइका" और "ग्लास्नोस्त", जिसमें कुछ बहुत ही क्रांतिकारी बदलाव शामिल हैं।
क्या यह ईश्वरीय लीला के अनुसार नए युग की शुरुआत है?
सबसे पहले, "पेरेस्त्रोइका" का वास्तव में अर्थ "पुनर्गठन" है। श्री गोर्बाचेव सोवियत राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को पूरी तरह से पुनर्गठित करने के लिए वास्तव में एक महान प्रयास में लगे हुए हैं। तदनुसार, उन्होंने बहुत ही सीमित समय के भीतर आश्चर्यजनक परिवर्तन किए हैं।
उन्होंने "ग्लासनोस्त का उपयोग करके सोवियत समाज को भी खोल दिया है, जिसका अर्थ है "खुलापन"।
अब, लोकतांत्रिक दुनिया को सोवियत संघ के बारे में कहीं अधिक समाचार मिल रहे हैं और सोवियत संघ के लोगों को अपने और बाकी दुनिया के मामलों के बारे में कहीं बेहतर समाचार मिल रहे हैं। इतना ही नहीं, बल्कि कई और लोग अब बिना किसी परेशानी के यू एस एस आर का दौरा कर रहे हैं।
मुझे यह उल्लेख करना चाहिए कि हाल ही में पश्चिम से लगभग चालीस सहज योगी रूस गए।
निमंत्रण अप्रत्याशित ही मिला। हमें जबरदस्त सफलता मिली और हजारों लोग उमड़ पड़े और उनमें से अधिकांश ने आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लिया। रूस पहला देश है जिसने सहज योग की अनूठी क्षमता को पूरी तरह से स्वतंत्र संगठन का आधिकारिक दर्जा देकर मान्यता दी है।
शायद उन्होंने महसूस किया है कि आत्म-साक्षात्कार के बाद ही आंतरिक परिवर्तन प्रक्रिया शुरू होती है जिसके माध्यम से अंततः आपको अपना ज्ञान प्राप्त होता है। यह हमारा अनुमान है। लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर भी, जहां तक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संबंध है, श्री गोर्बाचेव और उनकी नई नीतियों के परिणामस्वरूप पूर्व और पश्चिम के बीच तनाव कम हुआ है।
वास्तव में, एक बहुत ही विवेक पूर्ण दृष्टिकोण से, श्री गोर्बाचेव ने यह प्रदर्शित करने के लिए कई पहल की हैं कि वह पूर्व-पश्चिम संघर्ष में विश्वास नहीं करते, बल्कि पूर्व-पश्चिम सहयोग में विश्वास करते हैं।
शायद उनका मानना है कि सुधारित सोवियत पक्ष के दबाव को कम करके दुनिया के विभिन्न हिस्सों के लोगों के बीच बेहतर संबंध बनाने का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है, इस तरह धीरे-धीरे दुनिया में सुरक्षा की गहरी भावना पैदा की जा सकती है। अंततः वैश्विक शांति स्थापित हो सकती है।
उन्होंने विशेष रूप से निरस्त्रीकरण के संबंध में अपनी पहल से दिखाया है कि वह अब एक शक्तिशाली सैन्य बल के आधार पर कोई स्टैंड नहीं लेना चाहते हैं, जिसे वर्षों से पश्चिम में स्वतंत्रता के लिए खतरा माना जाता रहा है।
उन्होंने परमाणु क्षेत्र में और यहां तक कि परंपरागत ताकतों के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय साहस दिखाया है और समग्र निरस्त्रीकरण के लिए पूर्व और पश्चिम के बीच उत्साहपूर्ण वार्ता जारी रखी है।
हमें अब सराहना करनी चाहिए कि कैसे पश्चिम की आशंकाएं अपना सार खो रही हैं।
पश्चिमी गठबंधन में कई देशों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों में यह आज इतना स्पष्ट है।
उदाहरण के लिए, पश्चिम जर्मनी, जो कभी सोवियत संघ का कट्टर दुश्मन था, अब महसूस करता है कि रूस में जो परिवर्तन हुए हैं, वे केवल दिखावटी नहीं हैं, बल्कि वे मूलभूत परिवर्तन हैं। निष्कर्ष यह है कि पश्चिम को अब उपयुक्त तरीके से जवाब देना चाहिए।
हालांकि कुछ देशों ने वास्तव में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, परिणाम स्पष्ट हैं। इस प्रकार, पूर्व-पश्चिम संघर्ष अब दुनिया में संघर्ष का सबसे मुलभुत बिंदु नहीं रह गया है।
जब दो महाशक्तियों और उनके सहयोगियों के बीच बेहतर समझ होती है, तो स्वाभाविक रूप से नाटो गठबंधन में सोच पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। ऐसा नहीं है कि कोई यह कह सकता है कि सभी समस्याएं हल हो गई हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से अब "समस्या नंबर एक" नहीं है।
फिर समस्या क्या है? दुनिया को यह तय करना होगा कि वह एक लोकतांत्रिक रूस के जन्म की प्रसव पीड़ा को कम करने के लिए क्या कर सकती है और यह भी तय करना चाहिए कि बिना किसी अहंकार के तथाकथित मुक्त दुनिया की समस्याओं के बारे में सच्चाई कैसे बताई जाए।
यह पश्चिमी दुनिया की ईमानदारी और शांति के प्रति समर्पण के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह उनके लिए एक स्पष्ट नीति बनाने का क्षण है कि कैसे उस प्रक्रिया में मदद की जाए, साथ ही गहन आत्मनिरीक्षण के माध्यम से लगन और समझदारी से काम लिया जाए, कैसे अपने ही देशों में सुरक्षा और शांति स्थापित की जाए और उनके अपने लोगों के आत्म-विनाशकारी उपक्रमों पर अंकुश लगाया जाए। ।
यदि यह नीति सही है और इस प्रक्रिया को व्यावहारिक और मानवतावादी तरीके से समर्थन दिया जाता है, तो बहुत जल्दी इन परिवर्तनों को चमत्कारिक रूप से समेकित किया जाएगा और हम कम्युनिस्ट दुनिया में एक अधिक मानवीय मुक्त समाज देखेंगे।
मुझे लगता है कि रूसियों को वास्तविक स्वतंत्रता की आवश्यकता है, जबकि पश्चिम को विवेकपूर्ण आत्म-अनुशासन की आवश्यकता है। इस प्रकार, मेरा दृष्टिकोण यह है कि ये सही कार्य और ये उचित प्रतिक्रियाएं भाईचारे और शांति की एक बहुत ही सुंदर दुनिया के रूप में फलीभूत होंगी, जो अपने बोध के योग्य होगी।
हमें जिस गंभीर और खतरनाक समस्या का सामना करना है, वह निश्चित रूप से धार्मिक कट्टरवाद की है और हम किसी विशेष धर्म पर उंगली नहीं उठा सकते। आप जिधर भी दृष्टि डालते हैं, धर्म की अवधारणा अपने संस्थापक के मूल विचारों से बहुत दूर भटक गई है।
मैंने पहले भी कई बार कहा है और अब भी कहती हूं, अध्यात्म के वृक्ष पर अलग-अलग समय पर ऋषि, संत, पैगम्बर और दिव्य अवतार के रूप में कई सुंदर फूल प्रकट हुए हैं।
उन फूलों को दिव्यता के एक ही रस से पोषित किया गया था ताकि पूरी दुनिया के लिए प्रेम की सुगंध प्रकट हो सके।
लेकिन उन्हें मनुष्यों द्वारा जीवन के वृक्ष से तोड़ लिया गया और अब ये मृत फूल बिना किसी सुगंध या जीवन शक्ति के इतने सारे मृत धर्म बन गए हैं।
धर्म का उद्देश्य, मनुष्य को अधीनता की स्थिति से प्राणीसम मूल सहज प्रवृत्ति में रूपांतरित होने योग्य बनाना है और उसके बाद, उसे अपनी जन- जातीय प्रवृत्ति से मुक्त कराना है, जो असुरक्षा, भय और संघर्ष पर आधारित है| ईश्वर, सर्वशक्तिमान ईश्वर के साथ उनके योग के माध्यम से दिव्य कानूनों के प्रति सचेत प्रबुद्ध और पूर्ण मनुष्यों के रूप में उनके अंतिम रूपांतरण हेतु उन्हें तैयार करने के लिए उन्हें संतुलित करना है।
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न धर्मों के जागरण का यह मूल उद्देश्य था कि ईश्वर के संदेश के रूप में मनुष्य को उसकी प्रेम, सौंदर्य और आनंद की शक्ति से अवगत कराया जाए।
दुर्भाग्य से, समय के साथ धर्म सबसे जबरदस्त संघर्ष का बिंदु बन गया है। वे प्रेम और अंधश्रद्धा का उपदेश देते हैं, जबकि वे स्वयं धन या शक्ति-प्रधान हो गए हैं और इन तथाकथित धर्मों और धर्मों के सर्वोच्च पद पर आसीन लोग स्वयं ईश्वर को नहीं जानते। उन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं है।
इस प्रकार इन मानव-निर्मित धर्मों ने शुद्ध शास्त्रों की बातों को तोड़ा-मरोड़ा या युक्तिसंगत बनाया है। अपने शुद्ध रूप में, सभी धर्म एक सार्वभौमिक सिद्धांत से निर्मित होते हैं: तुम पहले स्वर्ग के राज्य की खोज करो, अर्थात् उस शाश्वत की खोज करो जो असीमित है और क्षणभंगुर (अस्थायी)का उपयोग केवल उसकी सीमाओं की स्पष्ट समझ के साथ करें।
लेकिन इसके विपरीत, व्यवहार में, मानव निर्मित धर्म दूसरों की अवमानना और घृणा के लिए इस धारणा पर संगठित होते हैं कि हम चुने हुए हैं और फिर भी वे चाहे किसी भी धर्म को मानते हों, ये कट्टर विश्वासी कितने भी पाप और अपराध करने में सक्षम हैं।
ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पास आत्मा के मार्गदर्शक तत्व की चेतना नहीं है, जो आत्म-साक्षात्कार के बाद ही हमारे चित्त में सहज रूप से कार्य करता है, जो अंततः हमारे पूर्ण ज्ञानोदय की ओर ले जाता है।
तब अच्छा या उच्च स्व, निम्न या निम्नतर स्व को नियंत्रित करता है। ऐसा, जो इस कलियुग या अंधेरे युग में, जिसमें हम रह रहे हैं, हमारी वास्तविक उत्थान के मार्ग पर हमारी पहुंच के भीतर निर्भर करता है।
अब, मैंने जो अनुभव किया है वह ऐसा है कि वास्तव में धर्म, लोगों को जोड़ने के बजाय, इंसानों को अच्छा और प्यार करने वाला बनाने के बजाय, लोगों को अपनी ही धारणाएं रखने वाला मानसिक कलाबाज़ और अपनी धार्मिक निष्ठा के डरावने रक्षकों में बदल देते हैं।
बेशक, वास्तव में सच्चाई सभी का बचाव करती है और उसे किसी बचाव की आवश्यकता नहीं है। अंत में मानव-निर्मित धर्मों के बारे में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वृक्ष अपने फलों से जाना जाता है।
बेशक, परिणामस्वरूप, बहुत से लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। वे ईश्वर को बिल्कुल नहीं मानते। वे केवल वही मानते हैं जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया जा सकता है, जो परिणाम देने के लिए प्रदर्शित किया जा सकता है।
लेकिन अगर आप वैज्ञानिक होना चाहते हैं तो आपको एक खुला दिमाग रखना होगा। आपको प्रत्यक्ष सत्यों के प्रमाणों पर विचार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तक आप ने ईश्वर की सर्वव्यापी शक्ति को महसूस नहीं किया, तब तक आप कैसे सुनिश्चित हो सकते हैं कि वह अस्तित्व में नहीं है?
यदि आप एक खुला दिमाग नहीं रखते हैं, तो यह केवल अहंकार ही है जो आपकी बुद्धि के शुद्ध प्रकाश को ढक रहा है। हालांकि, मैं आपको आश्वस्त कर सकती हूं कि समय आ गया है कि आप ईश्वर के अस्तित्व को अपने मध्य तंत्रिका तंत्र पर, यानी अपनी उंगलियों पर महसूस करके ईश्वर के अस्तित्व को साबित करें।
और इसलिए हम महसूस करते हैं कि मनुष्य को रूपांतरित होना है और आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से जागरूकता की एक उच्च अवस्था में प्रवेश करना है।
यह हमारे विकास की अंतिम सफलता होनी चाहिए, जो एक जीवंत प्रक्रिया है।
मेरे सामने प्रश्न यह है कि किस प्रकार अतीत और धर्मों की कंडीशनिंग के बुरे प्रभावों को दूर करके मनुष्य को सत्य और केवल सत्य की खोज करवायी जा सकती है।
यह एक बहुत ही नाजुक काम है, क्योंकि मानव अहंकार बहुत आसानी से चोटिल हो जाता है। जैसा कि मैंने पाया है, कितनी भी चर्चा या कोई भी मानसिक प्रक्रिया से इसे हासिल नहीं किया जा सकता। तो उत्तर क्या है?
स्वाभाविक रूप से; एकमात्र तरीका आत्म-साक्षात्कार के लिए आने वाले प्रत्येक साधक में विकास की जीवंत प्रक्रिया द्वारा आंतरिक परिवर्तन है।
यह दुनिया को बदलने के लिए काफी होगा।
एक और महत्वपूर्ण बिंदु, जिसे विशेष रूप से स्वतंत्र दुनिया द्वारा सराहा जाना चाहिए, वह यह है कि जब स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जाता है तो यह राक्षसी बन सकती है। क्योंकि तर्क शक्ति युक्त मानव की स्वतंत्रता का उपयोग जानबूझकर या अनजाने में विनाशकारी और बुरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भी किया जा सकता है।
उनमुक्त दुनिया में, राजनेता बहुत उत्सुक हैं कि यदि संभव हो तो वे अपनी सीटों से चिपके रहें और इसके लिए उन्हें मतदाताओं को खुश करना होगा। यही कारण है कि मतदाताओं को अपने निजी जीवन में बहकावे में आने की पूरी आजादी दी जाती है।
उन्हें अपने बिस्तर पर या पब में सूर्योदय से सूर्यास्त तक और फिर से सूर्यास्त से सूर्योदय तक पीने की स्वतंत्रता है। उन्हें एक-दूसरे को मारने के लिए कितनी भी बंदूकें रखने की आजादी है।
उन्हें आदिम लोगों की तरह बनने और एक इंसान के बजाय एक सेक्स प्वाइंट बनने की आजादी है, अगर वे चाहें तो। उन्हें ज्यादा काम करने या नहीं तो जॉगिंग से दिल का दौरा पड़ने की आजादी है। किसी भी टॉम, डिक या हैरी के साथ सोने से अपने पति या पत्नी का अपमान करने की आज़ादी।
सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक भारी, बहुत भारी रॉक संगीत सुनकर उन्हें अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को नष्ट करने की आजादी है।
मीडिया अब आत्म-सम्मान, शालीनता, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व से अपनी अंतिम मुक्ति प्राप्त कर चुका है, और किसी पर भी कीचड़ उछालने में, और राजनीतिक मतों की सेवा में सच्चाई को रोकने या सनसनी फैलाने में, बदनामी और यह जाने या इसकी परवाह किए बिना कि वे क्या पाप कर रहे हैं, ईश्वर की निन्दा कर सकते हैं।
उन्हें नकारात्मक आलोचना और विकृत मूल्यों के साथ रचनात्मकता को नष्ट करने की आजादी है। ताकि, कला की किसी भी शाखा में सार्वजनिक प्रशंसा प्राप्त करने के लिए, एक कलाकार कुछ अमानवीय या अश्लील का सहारा लेने के लिए बाध्य हो।
उन्हें गर्मी की धूप में अपनी चमड़ी जलाने और जाड़ों में जानवरों की तरह बिना कपड़ों के सोने की आज़ादी है।
सेक्स या समलैंगिक मुक्ति के धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता। कैंसर या एड्स पाने की स्वतंत्रता। उन्हें काला जादू करने और अपनी और दूसरों की मासूमियत को खराब करने की आज़ादी है। किसी भी बुरी आदत, (अभी तक ड्रग्स को छोड़कर), में लिप्त होने की स्वतंत्रता, लेकिन शायद कल ड्रग्स भी मुक्त हो जाएंगे क्योंकि एम्स्टर्डम में वे पहले से ही हैं।
वे जितना चाहें उतना पैसा जमा करने के लिए स्वतंत्र हैं, भले ही साधन कुछ भी हो। वे बेवकूफ और अजीब दिखने के लिए स्वतंत्र हैं, मूर्खता की श्रेणी में अंतिम शब्द बनने के लिए, समाज में, बिना शर्माए सबसे भयानक और असभ्य तरीके से चलने और बात करने के लिए। प्रत्येक महिला को एक वेश्या की तरह हर पुरुष के रूप को आकर्षित करने की स्वतंत्रता है, और प्रत्येक पुरुष को हमेशा के लिए युवा दिखने के लिए बाध्य किया जाता है और इसलिए वह कभी भी परिपक्व नहीं होता है और ज्ञान की ऊंचाइयों तक नहीं पहुंचता है। इस प्रकार, तथाकथित मुक्त या उछ्रंखल समाज, अपने पतन और अपने आत्म-विनाश की चरम सीमा तक पहुँच गया है।
तो इस तथाकथित स्वतंत्रता में दासता और विनाश की अपनी अंतर्निहित ध्रुवीयता है, जो साथ-साथ प्रकट होती है। और फिर भी अक्सर लोग बुराई के प्रति अंधे होते हैं और कोई स्पष्टीकरण किसी काम का नहीं होता।
यदि आप उन्हें यह बताने की कोशिश करते हैं कि वे खुद को नुकसान पहुंचा रहे हैं या नष्ट कर रहे हैं, तो वे बस यही कहेंगे, "तो क्या? क्या गलत है?"
स्वतंत्रता के नाम पर धीमी आत्महत्या या क्रमिक विनाश किया जाता है। लेकिन एक स्वतंत्र समाज का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि मनुष्य को वह करने की अनुमति है जो वह चाहता है चाहे वह अच्छा हो या बुरा। अच्छाई को बनाए रखने के महत्व के बारे में जागरूक होना होगा।
इसलिए उनमुक्त विश्व को यह विश्वास नहीं करना चाहिए कि उसकी लड़ाई साम्यवाद के खिलाफ है। उसे अपने ही देश में, अपने हाथों से लड़ाई लड़नी है, जिसका उसे सामना करना है। यदि वेह यह नहीं पहचानते है कि खुद वही उनकी सबसे बड़ी समस्या है, तो विनाश या अस्तित्व का भयानक संघर्ष होगा।
और यह पश्चिम में स्वतंत्रता का दुरुपयोग है जो मेरे विचार से आज दुनिया के सामने मूलभूत समस्या है।
मुझे उम्मीद है कि रूसी अपनी बुद्धिमता और अपने विवेक को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे और स्वतंत्रता के उत्थान का लक्ष्य रखेंगे न कि स्वयं को नष्ट करने की स्वतंत्रता का, जैसा कि पश्चिम फुटबॉल गुंडों और माफियाओं जैसे विपत्तियों का एक मेजबान बनाकर कर रहा है, सभी के नाम पर स्वतंत्रता।
अगर एक उनमुक्त समाज में युवा और परिपक्व उम्र के लोग खुले तौर पर अपमानजनक तरीके अपना सकते हैं, तो वह समाज एक बुनियादी बीमारी से ग्रस्त होना चाहिए। इसलिए, ऐसे समय में जब साम्यवादी देश अपनी स्थिति की व्यापक समीक्षा कर रहे हैं, पश्चिमी दुनिया को भी उसी तरह की मौलिक समीक्षा करने की आवश्यकता है।
इसकी सबसे मुख्य समस्या अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग है, उसका समाधान खोजना होगा,।
एक और गंभीर समस्या पर्यावरण की है। अब इंसान का अस्तित्व ही खतरे में है। लोग अब पर्यावरण को होने वाले नुकसान और ओजोन परत के क्षरण के बारे में जागरूक हो गए हैं। हमारे पास अभी भी अम्लीय वर्षा क्यों होती है?
हमारे पास दुनिया भर में अक्सर विनाशकारी जलवायु समस्याएं क्यों होती हैं? हमें इन समस्याओं के उत्तर तलाशने होंगे। यह एक असाधारण बात है कि विकसित दुनिया में भी अब आप खाने के लिए उचित भोजन पाने के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाते।
हर दिन साल्मोनेला को ले कर एक नया डर होता है या प्रतिबंधित खाद्य सूची में एक नया उत्पाद डाला जाता है। ऐसे में अब फूड पॉइजनिंग एक बहुत ही गंभीर मुद्दा बन गया है। यह क्या दर्शाता है?
हमें यह जानना होगा कि यह औद्योगिक विकास की पराकाष्ठा है, जिससे हम मशीनों के गुलाम बन गए हैं। मशीनें हमारे अपने उपयोग के लिए बनाई गई हैं और फिर भी हम मशीनों के शिकार बन गए हैं।
हमें मशीन से बने और हाथ से बने सामानों के बीच संतुलन बदलना होगा और प्राकृतिक चीजों को अधिक अपनाना होगा। मशीनें प्लास्टिक जैसी चीजें बनाती हैं, जिनमें कोई प्राकृतिक स्पंदन नहीं होता और जो वास्तव में मनुष्य के लिए हानिकारक होती हैं।
लेकिन यह कैसे हासिल किया जाए यह समस्या है। अपने दैनिक जीवन में प्लास्टिक जैसी बेकार चीजों की खपत को कैसे कम करें?
हमारी एक और समस्या समाज में लोगों के बीच संबंधों की है। पति-पत्नी के बीच या एक इंसान से दूसरे इंसान के बीच के संबंध बहुत बनावटी हो गए हैं। वे अब सीधे और सरलता से एक-दूसरे से संबंधित नहीं रह सकते हैं, बल्कि संबंध बनाये रखने के लिए बीच में कुछ होना चाहिए।
जैसे, टेलीविजन या तकरार, बस संबंध बनाने के लिए। मुझे बताया गया है कि कुछ लोग हैं, जो अपने पति या अपनी पत्नी के बजाय रेफ्रिजरेटर से बात करना पसंद करते हैं, क्योंकि यह उन पर आक्रमण नहीं करेगा। यहां तक कि विकसित देशों में लोगों के पालतू जानवर अन्य मनुष्यों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
उनके कुत्ते उनके बिस्तर पर, उनके भोजन कक्ष की मेज पर हैं, लेकिन वे अपने बच्चों को दूसरे कमरे में धकेल देंगे। वे अपने जन्मदिन पर अपने कुत्तों या बिल्लियों का अपनी मेज पर मनोरंजन करेंगे, जबकि हजारों मनुष्यों को खाने के लिए पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है।
यह एक अजीब तरह का समाज हमने विकसित किया है और हम देख सकते हैं कि सबसे पहले हममें यह समझने की परिपक्वता की कमी है कि हम व्यक्ति नहीं हैं बल्कि हम वैश्विक संपूर्ण का हिस्सा हैं। हमारी आजादी ने हमें परिपक्व होने का मौका ही नहीं दिया, ना ही यह भी जानने का मौका दिया कि ईश्वर ने यह दुनिया बनाई है- उसने राष्ट्र नहीं बनाए।
तुम बहुत बूढ़े लोगों को युवा लड़कियों के पीछे दौड़ते हुए देखते हो, बूढ़ी औरतें छोटे लड़कों के पीछे भागती हैं। यह अप्राकृतिक है।
बाल शोषण और अबोधिता के विनाश में भयानक वृद्धि हो रही है। यह ऐसा है जैसे वे किसी के निर्दोष होने को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
लोग स्वाभाविक रूप से बूढ़े भी नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए, दूसरे दिन मैंने देखा, कई अस्सी साल के अभिनेता और अभिनेत्रियाँ रॉक एंड रोल और शेक डांस कर रहे थे। उन्हें इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी; वे अपने हाथों में चलने की छड़ियां लिए काफी अस्वाभाविक रूप से खुद को हिला रहे थे।
ये सभी बातें अजीब लग सकती हैं, लेकिन वास्तव में ये बहुत गंभीर हैं और एक देश जो ऐसे अपरिपक्व, पागल, बीमार लोगों से भरा हुआ है, अपने विकास और हमारे उत्थान के लिए इसके मूल्यों की परवाह किए बिना कुछ भी तलाशेगा।
लोग ही समाज का निर्माण करते हैं और समाज ही देश को बचाए रखता है। तो इस तरह की आज़ादी से आने वाली इन सभी पागल चीजों को पुनर्विचार करके ठीक करना होगा अन्यथा ये देश जल्द ही बर्बाद कर दिये जायेंगे।
मेरे मन में, केवल एक ही समाधान है; वह है मनुष्य का परिवर्तन। अब यह परिवर्तन संभव है, यहीं और अभी, और बड़े पैमाने पर। मैं आपको एक और अवसर पर दिखाना चाहती हूं कि यह कैसे किया जा सकता है और कैसे मनुष्य की मुक्ति, अनायास और सहजता से और निशुल्क कार्यान्वित किया जा सकता है। एक दिन मैं आपको दिखाऊंगी कि, कैसे सहज योग के माध्यम से आप खुद को बदल सकते हैं और दुनिया को बदल सकते हैं।