Agnya Chakra

Agnya Chakra 1984-03-17

Location
Talk duration
106'
Category
Public Program
Spoken Language
English, Hindi, Marathi

Current language: Hindi, list all talks in: Hindi

The post is also available in: English.

17 मार्च 1984

Public Program

New Delhi (भारत)

Talk Language: English, Hindi | Transcript (Hindi) - Draft | Translation (English to Hindi) - Draft

Agnya Chakra, Public Programme, Delhi (India), 17 March 1984.

सत्य के सभी साधकों को मैं प्रणाम करतीं हूँ। मैं आज आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएँ देना चाहतीं हूँ। यह हम सभी के लिए बहुत आनंद का दिन है और मैंने कल आपको विशुद्धि चक्र के बारे में बताया था, जहाँ श्री कृष्ण निवास करते हैं और उन्होंने होली के त्योहार की शुरुआत क्यों की। जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था, यह जड़ों का ज्ञान है जबकि हमारे पास कॉलेजों, मेडिकल कॉलेज, मनोविज्ञान तथा अन्य विज्ञान महाविद्यालय, में जो भी ज्ञान है जो मानव-जाति से सम्बंधित वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक आँकड़े, का ज्ञान है, वृक्ष का है। इसलिए जड़ों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें सूक्ष्म व्यक्ति बनना होगा। मानवीय चेतना के साथ हम स्वयं में गोता नहीं लगा सकते। उदाहरण के लिए, आप सभी मुझ पर ध्यान दे रहे हैं लेकिन अगर मैं कहूँ कि, अपना ध्यान अपने भीतर ले जाइए, तो आप नहीं ले जा सकते हैं। आप कहेंगे, "कैसे करें?

यह अंदर नहीं जाता।" हमारा ध्यान बाहर की ओर फैला हुआ है - हम ऐसे ही बने हैं विशेषतः, कि हम अपना ध्यान बाहर की और रखें और अपनी आज़ादी का मूल्य समझें। मनुष्य होने के नाते हम सही और गलत का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं। हमने परंपराओं के माध्यम से सही और गलत के बारे में बहुत सारे सही विचार विकसित किए हैं लेकिन ऐसे बहुत से संत और द्रष्टा हुए हैं जिन्होंने हमें क्या सही और क्या गलत है, इसके बारे में पूरी जानकारी दी है। इसके बावजूद, हमें धार्मिक होना, गुणी होना, वह होना जिस पर हम विश्वास करते हैं, मुश्किल लगता है। हम कुछ देखते, सुनते, जानते हैं, कि यह अच्छा है कि हमें ऐसा ही होना चाहिए, लेकिन हम ऐसा कर नहीं सकते। हम 'समर्थ' नहीं हैं, हम वह करने में सक्षम नहीं हैं जिस पर हम विश्वास करते हैं। इसका कारण यह है कि हमारा व्यक्तित्व एकीकृत नहीं हैं। हमारा मस्तिष्क कुछ कहता है, हमारा हृदय कुछ और बात कहता है और हमारा जिगर कुछ और काम करता है। इस प्रकार हम तीन, चार व्यक्तित्वों में विभाजित हैं और इसीलिए हम खुद को एकीकृत नहीं कर सकते हैं। खुद को एकीकृत करने के लिए, हमें कुछ ऐसा बनना होगा जो स्वयं अपने भीतर एकीकृत हो। अब यह एकीकृत 'स्व' आत्मा है। आत्मा हृदय में निवास करती है। यह सभी संतों द्वारा कहा गया है लेकिन सहज योग में, अब हम यह साबित कर सकते हैं कि यह वास्तव में निवास करती है। अर्थात्, सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वयं को आत्मा के रूप में हृदय में प्रतिबिम्बित करते हैं। और आत्मा ही वह है जो हर समय हम को देखती रहती है। आत्मा हमारे चित्त में प्रकाशित नहीं होती है। अगर यह प्रकाशित होने लगे हमारे चित्त में, फिर हम अपने केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर महसूस करना शुरू करते हैं आत्मा की शीतलता, आत्मा का स्पंदन, प्रकटीकरण आत्मा का। लेकिन जब यह प्रकाशित नहीं होता है, तो यह बाहर रहता है और साक्षी के रूप में हमें देखता है। अब, यह आत्मा ही एक है, जो एकीकृत केंद्र बिंदु है। एक बार जब हम आत्मा बन जाते हैं तो ये सभी प्राणी जो हमारे भीतर हैं जो विघटित हो गए हैं, वे पूर्णतया एकीकृत हो जाते हैं और इस तरह हम वह करने में सक्षम हो जाते हैं जो हमें अच्छा या सही लगता है अपने मन से, अपने प्रयासों से और अपने प्यार के माध्यम से। यह सब एक साथ संयोजित होता है और हम वह सब कुछ करते हैं जिसमें पूर्ण एकीकृत अभिव्यक्ति होती है। अब आत्मा बनने के लिए, लोगों ने कहा है कि आपको ध्यान करना होगा, आपको अपने भीतर जाना होगा क्योंकि श्री कृष्ण के समय में वे इन स्तरों पर बात नहीं कर सकते थे क्यों कि लोग इसे समझने के लिए इतने सुसज्जित नहीं थे। अब ध्यान कैसे किया जाए, यह भी फिर से एक समस्या है। अगर मैं कहूँ कि आपको ध्यान करने के लिए अपने भीतर जाना होगा, तो आप कहेंगे कि अन्दर कैसे जाएँ? अब, हमें समझना होगा, कि परमेश्वर ने हमें बहुत खूबसूरती से बनाया है। हम कभी भी यह सवाल नहीं पूछते कि, "उन्होंने हमें इंसान क्यों बनाया है?" "हम मनुष्य बनने के लिए उत्क्रांति की पूरी प्रक्रिया से क्यों गुज़रे?" अब हम मानव बन गए हैं लेकिन क्यों, हम इंसान क्यों हैं? और अगर मनुष्य उत्क्रांति की चरम सीमा है, तो फिर समस्याएँ क्यों हैं, हम एकीकृत क्यों नहीं हैं? तो, हमें थोड़ी और ऊपर छलाँग लगानी होगी, ऊँची अवस्था, थोड़ी अधिक जागरूकता जिससे हम परम निरपेक्ष प्रकृति को समझना शुरू कर दें। अभी हम बिल्कुल सापेक्ष शब्दावली पर जी रहे हैं। सब कुछ सापेक्ष है। आप नहीं जानते कि यह अच्छा है या बुरा, यह किया जाना चाहिए या नहीं? लेकिन एक आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति के लिए इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि वह जानता है कि उसकी आत्मा उस चैतन्य को उत्सर्जित कर रही है, जो हर समय बह रहे हैं और यदि वह कुछ गलत करने की कोशिश करता है, तो वे तुरंत रुक जाते हैं। तो, एक कंप्यूटर की तरह वह जुड़ जाता है या आप कह सकते हैं, ईश्वर के साथ योग हो जाता है और फिर कंप्यूटर काम करना शुरू कर देता है और सूचित करता है कि यह सही नहीं है और वह सही नहीं है। यह एक बहुत ही अद्भुत कंप्यूटर है जिसे भगवान ने बनाया है; हम सबसे असाधारण प्रकार के कंप्यूटरों में से एक हैं। दुनिया में ऐसे कंप्यूटर हैं जिन्हें इंसानों ने बनाया है इसे सोचने की शक्ति से गुजरना पड़ता है और फिर किसी नतीजे पर पहुँचना होता है और यह सोच भी किसी दूसरे सोचने वाले व्यक्ति द्वारा ही डाली जाती है, जिसने बहुत सीमित ऊर्जा से सोचा है। लेकिन हम सोचते नहीं बल्कि देखते हैं। मैं आपको बिना सोचे देखतीं हूँ, मैं आपको बिना सोचे देख सकतीं हूँ। जैसे ही मैं आपको देखतीं हूँ, मैं जानतीं हूँ कि आप कौन हैं, लेकिन कंप्यूटर के लिए, उसे एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, यह पता करने के लिए कि वह व्यक्ति कौन है। अब हमारे सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि लोग जीवन के हर क्षेत्र में कृत्रिम तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि वे अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचे नहीं जा पाए हैं, क्योंकि वे अपनी उन्नति से चूक गए हैं, इसलिए वे सभी प्रकार की कृत्रिम चीजों का सहारा ले रहे हैं। सबसे पहले वे कंप्यूटर जैसी कृत्रिम चीजों को अपना रहे हैं। अब ये कंप्यूटर बहुत खतरनाक हो सकते हैं क्योंकि पदार्थ हर समय आत्मा पर हावी होने की कोशिश कर रहा है। जब आप कोई मशीन बना रहे होते हैं, तो आपको पता नहीं होता कि आप मशीनरी के चंगुल में कितना फँस रहे हैं। कि मशीन एक दिन, यदि आप अपनी स्वतंत्रता का दृणतापूर्वक दावा नहीं करते और मशीन की शक्तियों की आनुपातिक समझ भी, हो सकता है कि आप पूरी तरह से ख़त्म हो जाएँ। आप देख सकते हैं कि ये कंप्यूटर अब बोल सकते हैं, नियंत्रण ले सकते हैं। मान लीजिए कि कंप्यूटर में कुछ गड़बड़ हो जाती है, तो यह पूरी दुनिया को निगल सकता है - आप इसे कैसे रोक सकते हैं? क्योंकि, यह एक मशीन है, यह जड़ पदार्थ है जो यह नहीं समझता - वह निर्दोष है। वह यह नहीं समझता कि वह निर्माण कर रहा है या विनाश। तो, यह एक बहुत ही खतरनाक बिंदु है जहाँ हम पहुँच चुके हैं। हर क्षेत्र में हम ऐसे खतरनाक काम कर रहे हैं। जैसे कृषि पक्ष में हम देख सकते हैं कि हम एक संकर बीज बनाने का प्रयास करते हैं; हाइब्रिड बीज से कभी बीज नहीं बन सकते। इसके अलावा यह हाइब्रिड व्यवसाय समस्याएँ भी देता है। यदि आप एक संकर गाय और एक साधारण गाय का अध्ययन करें, तो आप आश्चर्यचकित होंगे कि एक संकर गाय को अपने बच्चे के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं है। अगर वह, अगर एक साधारण गाय का बछड़ा मर जाता है, तो वह दूध देना बंद कर देती है, वह दूध देना बंद कर देती है क्योंकि उसका प्यार उसे बताता है कि बच्चा अब नहीं रहा - अब दूध देने का क्या फायदा, किसके लिए? लेकिन अगर एक संकर गाय का बछड़ा मर जाता है, तो उसे इससे कोई परेशानी नहीं होती है। आप हमारे गाँवों में पाई जाने वाली छोटी मुर्गी को देखिये - क्योंकि लोगों ने अब उनका बहुत अच्छे से अध्ययन कर लिया है - वे कहते हैं, एक मुर्गी, जो एक साधारण मुर्गी है, जो एक सामान्य मुर्गी है, अगर वह अपने आस-पास छोटे-छोटे चूजों को देखती है और जब वह देखती है कुछ पक्षियों द्वारा किसी प्रकार का हमला या कुछ और, वह तुरंत बुलाती है छोटे चूज़ों को और उनपर अपना पूरा संरक्षण डालती है। लेकिन अगर आपके पास कोई है, मान लीजिए, कोई ऐसा जो हाइब्रिड है इनक्यूबेटर या कुछ और - वे अपने बच्चों के लिए कोई भावना नहीं रखते, उनके मन में अपने बच्चों के प्रति कोई भावना नहीं होती, इसलिए भले ही कोई चूहा आ रहा हो - कुछ भी - उसे कोई फर्क नहीं पड़ता - कोई बच्चों को खा ले, उन्हें जो अच्छा लगे वो करे। हमारे जीवन में इतना कुछ चल रहा है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम पर जड़ पदार्थ का कितना प्रभाव है। जड़ पदार्थ बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है लेकिन यह देखना होगा कि यह आत्मा के साथ क्या करता है। अब उदाहरण के लिए, हम पदार्थ के साथ जो करते हैं, वह उसके रूपों को बदलने के अलावा और कुछ नहीं है। हम यह सोचकर अहंकार विकसित करते हैं, 'हमने यह किया है, हमने वह किया है, हमने यह बड़ी चीज़ बनाई है और हमारे पास विशाल, बड़े महल हैं जो हमारे द्वारा निर्मित हैं।" लेकिन ये सब चीज़ें क्या हैं - ये तो सिर्फ़ पत्थर हैं - मरी हुई से मरी हुई। आपने क्या हासिल किया है? कुछ नहीं, बस एक अहंकार, जो बिल्कुल - अहंकार का अर्थ है कुछ ऐसा जिस पर आप विश्वास करते हैं जिसका अस्तित्व नहीं है। तो आप किसी ऐसी चीज़ पर विश्वास करते हैं जो पदार्थ है, कि आपने पदार्थ के रूप को बदल दिया है लेकिन परिणामस्वरूप क्या होता है, आप पदार्थ के गुलाम बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग कुर्सी के अभ्यस्त हैं, वे ज़मीन पर नहीं बैठ सकते। आप इसके अभ्यस्त हो जाते हैं, आप आदतें बना लेते हैं और यह जड़ता हर समय आप पर हावी होने लगती है। जब पश्चिम में पूरी विचारधारा व्यक्तिगत विकास से शुरू होती है और आराम की भी - आराम पश्चिमी दर्शन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है कि आपको आराम अवश्य प्राप्त करना चाहिए और जब आप शरीर का आराम तलाशने लगते हैं, क्या होता है, कि आपका शरीर इतना गुलाम बन जाता है भौतिक चीजों का कि आप बिल्कुल अचंभित हैं जिस तरह से आप एक बहुत ही हास्यास्पद/अजीब स्थिति में पहुँच जाते हैं। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में, अब मैं वहाँ हूँ, मुझे ताजा चिकन मिलना असंभव है, ताज़ी भेड़(मेमना) मिलना असंभव है, सब कुछ डिब्बाबंद है और आप इसे बदल नहीं सकते क्योंकि यह उस तरह के बड़े उद्योग, औद्योगिक प्रक्रिया में चला गया है कि यदि आप कुछ ऐसा चाहते हैं जो सरल हो, प्राकृतिक हो, आप इसे प्राप्त ही नहीं कर सकते। आपको वैसे ही करना होगा जैसे कि वहाँ सब के लिए होता है और यही आपको स्वीकार करना होगा। जबकि भारत में, भगवान का शुक्र है, हम इतने पागल नहीं हैं, कि हमें अभी भी बहुत सारी चीजें मिल जाती हैं जो ताज़ा होतीं हैं। लेकिन इस संसार में सबसे बड़ी चीज़ जो हमें मिल सकती है वो है प्यार, अन्य लोगों का प्यार। होली उन त्यौहारों में से एक है जिसमें हम सभी लोगों के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं। अब, अगर आप इंग्लैंड या किसी अन्य पश्चिमी देश में जाएँ, प्रेम को एक छपे हुए कार्ड के माध्यम से व्यक्त किया जाता है, जहाँ हम कहते हैं, "हम आपको क्रिसमस की शुभकामनाएँ देते हैं," - समाप्त। अपने पिता को भी वे एक कार्ड भेजते हैं, "हम आपको क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं।" आप बाजार जाइए, कुछ कागज़ लीजिए, लिखिए या फिर उन्हें सब कुछ रेडीमेड मिल जाएगा। आपको माँ के लिए रेडीमेड मिलता है, पिता के लिए रेडीमेड, दादाजी के लिए रेडीमेड, हर चीज़ के लिए रेडीमेड। बस तैयार सामान ले आओ और उसे लिख कर भेज दो। मैंने देखा है कि कभी-कभी लोग गलतियाँ करते हैं और वे एक, एक भेज सकते हैं इन रेडीमेड चीज़ों को इतने मज़ेदार तरीके से कि बच्चे को सम्बोधित करने के बजाय, वे इसे दादी को संबोधित कर सकते हैं। तो, यह इतना यंत्रीकृत जीवन है कि आपने वह लचीलापन खो दिया है, जो वास्तव में हमारे ह्रदय में प्रेम को प्रेरित कर सकता है। ऐसे लोग बिल्कुल शुष्क हो जाते हैं, उनमें किसी के लिए कोई प्यार नहीं होता है। और उन्हें सिर्फ़ भौतिक चीज़ें चाहिए - यह चीज़ें आपको आनंद नहीं दे सकतीं। अर्थशास्त्र में पहले ही कहा जा चुका है, अगर आप देखें, अर्थशास्त्र का पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम है, कि 'एक इच्छा विशेष रूप से संतुष्ट की जा सकती है लेकिन सामान्य रूप से नहीं।' मतलब, कोई भी चीज़ आपकी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकती। आज आपको साइकिल चाहिए, कल कार, फिर घर, फिर हवाई जहाज - मुझे नहीं पता कि आगे क्या और। इसलिए वह व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता जो भौतिक वस्तुओं में आनंद ढूँढ़ने का प्रयास करता है। तो अब, हम उस बिंदु पर आते हैं जहाँ हम देखते हैं कि ये पश्चिमी देश, जैसा कि मैंने आपसे पहले ज़िक्र किया था, तीन समृद्ध देश जैसे स्वीडन, नॉर्वे और स्विटजरलैंड आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं कि आत्महत्या की प्रवृत्ति की दर क्या है और कितने लोग आत्महत्या करते हैं। अब निःसंदेह, इस साल उन्होंने स्विट्जरलैंड को पुरस्कार दिया है क्योंकि उनमें सबसे ज्यादा संख्या में लोग, युवा लोग, हैं जो आत्महत्या कर रहे हैं। हाँलाँकि उनकी आय सबसे अधिक है, इसके बावजूद वे आत्महत्या कर रहे हैं। क्योंकि उन्होंने आनन्द नहीं पाया है। उन्होंने सब कुछ किया है। उनके पास खूबसूरत रेलवे है, उनके पास खूबसूरत टेलीफोन हैं - दिल्ली के टेलीफोनों की तरह नहीं और उन्हें सब कुछ उत्तम दर्ज़े का मिला है। इन सबके बावजूद उन्होंने अब फैसला कर लिया है कि अधिकांश युवा लोगों को आत्महत्या कर लेनी चाहिए - यही एकमात्र तरीका है जिससे उनका अस्तित्व रह सकता है। इससे एक बात निश्चित रूप से पता चलती है, कि उनकी गति, भौतिक कल्याण की उपलब्धि की ओर, ने उन्हें कोई भी ठोस मूल्य नहीं दिया है। इसलिए अब वे ईश्वर की ओर, आत्मा की ओर मुड़ रहे हैं, यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि आत्मा बनने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। अब हमें यह जान लेना चाहिए कि जिन लोगों ने आत्मा की बात की है, झूठ नहीं बोला है। उन्होंने हमसे झूठ नहीं बोला - यह पहली बात है जो हमें जाननी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, "हम भगवान में विश्वास नहीं करते" - मुझे लगता है कि यह पूर्ण अहंकार की निशानी है, यह अज्ञानता का भी संकेत है कि आप बस कहते हैं, "मैं भगवान में विश्वास नहीं करता।" यह उस व्यक्ति की तरह है जो विश्वविद्यालय या स्कूल जाता है और वहाँ जाकर अपने शिक्षक से कहता है, "मुझे इस बात पर विश्वास नहीं है कि ऐसा हो सकता है।" यदि आप समझदार और संतुलित व्यक्ति हैं और बुद्धिमान हैं, तो आप इस पर विचार कर सकते हैं, आज दुनिया में नैतिक संकट क्यों है, हम इतना कष्ट क्यों झेल रहे हैं?

कारण है, कि हमने भौतिक जीवन को बहुत अधिक महत्व दे दिया है। बहुत ज़्यादा महत्व। भौतिक जीवन का भी आध्यात्मिक जीवन के बिना आनंद नहीं लिया जा सकता। अब, मैं आपको बताऊँगी कि क्या होता है जब कुंडलिनी आज्ञा चक्र से ऊपर उठती है। जो कि ऑप्टिक चियास्मा में पिट्यूटरी और पीनियल बॉडी (ग्रंथि) के बीच स्थित है। ऑप्टिक चियास्मा में यह अति महत्वपूर्ण केंद्र है। अब इस महत्वपूर्ण केंद्र को माइक्रोस्कोप या किसी भी चीज़ के माध्यम से नहीं देखा जा सकता लेकिन यह इस शक्ति को तब प्रकट और प्रयोग करता है जब आप कुंडलिनी को उठते हुए देखते हैं। जब कुंडलिनी ऊपर उठती है, तो वह अधिकतर उस बिंदु पर रुक जाती है, जिसे हम आज्ञा चक्र कहते हैं। आपने अभी देखा - कल आपने देखा कितने लोगों को यह समस्या थी उनकी कुंडलिनी का नाभि चक्र या आज्ञा चक्र पर रुक जाना। जब यह नाभि चक्र पर रुकती है तो आप स्पष्ट रूप से अपनी आँखों से स्पंदन देख सकते हैं कुंडलिनी का, जो उठती है और यकृत या कुछ स्थानों पर जाकर रुक जाती है। लेकिन आज्ञा चक्र पर आप देख नहीं सकते। जब यह आज्ञा चक्र पर रुकती है तो नीचे भी गिर जाती है। अब यह आज्ञा चक्र जो पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथि के बीच स्थित है ऑप्टिक चियास्मा के केंद्र में, वह, जो कि एक बहुत ही संकीर्ण द्वार है, जो एक बहुत ही संकरा द्वार है जिससे किसी को गुजरना ही था यह साबित करने के लिए कि अनन्त जीवन की खोज की जानी चाहिए। जैसा कि कृष्ण ने शाश्वत जीवन के बारे में कहा है, 'नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।' 'नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः, न चैनं.... न शोषयति मारुत।' आप देखिए बात यह है, 'न क्लेदयन्त्यपो न शोषयति मारुत।' इसका कारण है कि वह यह कहना चाह रहे हैं कि इसे मारा नहीं जा सकता, इसे नष्ट नहीं किया जा सकता, इसे अंदर सोखा नहीं जा सकता।' वह क्या है? वह आध्यात्मिक जीवन है, वह शाश्वत जीवन है जो हमारे भीतर है। अब आप इसे कैसे करेंगे? आपको वह शाश्वत जीवन कहाँ से मिलेगा जिसे कुचला नहीं जा सकता? अगर किसी को दिखाना ही पड़े तो वह क्या है? कृष्ण ने अपने जीवनकाल में इसका इतना स्पष्ट वर्णन किया है कि, 'आपको वह शाश्वत जीवन प्राप्त करना है, जो मैं आपको बता रहीं हूँ।' तो किसी को इस धरती पर, इस आज्ञा चक्र पर आकर इस पर काम करना था। उसमें मैं यही कहूँगी कि आपको इनमें से कुछ ग्रंथ पढ़ने चाहिए महाविष्णु के बारे में, जिसका वर्णन मार्कंडेय ने किया है। मार्कण्डेय ही वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने महाविष्णु की उत्पत्ति का बहुत स्पष्ट वर्णन किया है। महाविष्णु की रचना श्री राधाजी ने की। श्री राधाजी महालक्ष्मी हैं, सुषुम्ना हैं, हमारे भीतर पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र है। उन्होंने अपनी इच्छा शक्ति से इन महाविष्णु का सृजन किया है। और यह एक अंडे की तरह था और इसका आधा हिस्सा सक्रिय हो गया और महाविष्णु बन गया और उन सक्रीय महाविष्णु के साथ हम आज्ञा चक्र को पार कर सकते हैं। जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था कि हमारे दस गुरु इस धरती पर आए थे और वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की अबोधिता का प्रतिनिधित्व करते थे, दत्तात्रेय के और उनमें से एक थे ज़ोरास्टर, दूसरे थे मोहम्मद साहब और ये सभी गुरु इन तीन व्यक्तित्वों की अबोधिता के गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें दत्तात्रेय कहा जाता है। और आपको यह भी बताया था कि इन विभिन्न गुरुओं को समझकर हम कैसे अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव डाल सकते हैं। जैसे, हमारे पास एक डॉक्टर, जो ईरान से आये थे और उस दिन मैं बहुत थकी हुई थी, बहुत थकी, और मैंने उनसे कहा कि 'अगर आप ठीक होना चाहते हो तो आपको सिक्ख सज्जन बनना होगा।' और, 'मैं आपकी ज्यादा मदद नहीं कर सकती क्योंकि आप यह नहीं मानते कि मोहम्मद साहब के अलावा कोई और भी है।' और वह बहुत क्रोधित हुए। मैंने कहा, 'मैं वास्तव में बहुत थक गईं हूँ और एक वाक्य में मैं इसे खत्म करना चाहतीं हूँ क्योंकि मैं वास्तव में बहुत थक गईं हूँ।' तो वह चले गए और अगले दिन वापस आये और बहस करने लगे। उन्होंने कहा, "आप कैसे, आपका इससे मतलब क्या है?" मैंने कहा, "मेरा मतलब है कि मुहम्मद साहब और गुरु नानक एक ही व्यक्तित्व हैं।" उन्होंने कहा, "आप ऐसा कैसे कहते हैं?" मैंने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि एक बार गुरु नानक लेटे हुए थे और लोगों ने कहा कि साहब आपके पैर मक्का की ओर हैं।" तो उन्होंने कहा, "ठीक है, मैं इस तरफ मुड़ता हूँ।" वह दूसरी तरफ मुड़े और मक्का दूसरी तरफ था। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि मक्का मोहम्मद साहब के चरणों में है श्री गुरुनानक के चरणों में भी। इसका मतलब है कि वे दोनों एक ही व्यक्तित्व हैं। और यदि आप मुझसे बहस करना चाहते हैं, तो मैं मैं आपको नहीं बता सकती कि कैसे, लेकिन मैं आपको एक बात बताऊँगी कि अगर आप अपने पेट के कैंसर से रोग मुक्त होना चाहते हैं तो आपको गुरु नानक पर विश्वास करना होगा।' उन्होंने कहा, "मैं गुरुनानक पर विश्वास नहीं कर सकता।" मैंने कहा, "मैं आपको ठीक नहीं कर सकती, मुझे खेद है, मैं बस आपकी मदद नहीं कर सकती।" वह घर चले गए। उनकी पत्नी समझदार महिला थीं उन्होंने कहा, "मेरे पति अब मरने वाले हैं।" उन्होंने कहा, "ठीक है, क्यों न गुरुनानक पर विश्वास किया जाए, देखते हैं क्या होता है।" तो वह 3-4 दिन बाद आये, उनकी हालत बहुत खराब थी और वह बोले, "ठीक है माँ, अब हम गुरुनानक के बारे में जानना चाहेंगे।" तो मैंने उन्हें गुरुनानक की महानता के बारे में बताया, कि वे इस धरती पर क्यों आए क्योंकि उन्होंने पाया कि मोहम्मद साहब ने जो किया था, उसे मुसलमानों ने नकार दिया है इसलिए वह भारतीयों को मोहम्मद साहब के बारे में बताने के लिए धरती पर आये और अन्य गुरुओं के बारे में तथा हिंदू और मुसलमानों में एकता लाने के लिए। लेकिन अब आप देख सकते हैं कि क्या हो रहा है उसको भी। तो इन महान लोगों ने जो भी अच्छा काम किया है, वह सब हमारी अपनी विचारधाराओं और उसमें हमारे अपने पक्षपाती तर्कों को जोड़कर इसे निष्प्रभावी कर दिया जाता है। और यही सभी महान गुरुओं के साथ हुआ। अब जैसा कि मैंने आपको बताया कि गुरु समस्या से आपको पेट की समस्या भी हो जाती है। उदाहरण के लिए जो व्यक्ति दत्तात्रेय का अनुसरण करता है, उसे हमेशा पेट की समस्या रहेगी, और यदि पको उसे सुधारना है, तो आपको उसे बताना होगा कि दत्तात्रेय का नाम कैसे लेना है। अब उसी तरह हम जानते हैं कि ईसा मसीह इस धरती पर आए और वे स्वयं श्री गणेश के अवतार थे। श्री गणेश एक 'चिर बालक' हैं, एक शाश्वत बालक हैं और इसी वज़ह से उन्होंने इस धरती पर ईसा मसीह के रूप में जन्म लिया। इसलिए जब आप क्रॉस देखते हैं, तो लोग डर जाते हैं। जब लोगों ने महाराष्ट्र में क्रॉस देखा तो उन्होंने कहा, "हे माँ, क्या आप ईसाई धर्म का प्रचार कर रही हैं?" मैंने कहा, "मान लीजिए कि स्वस्तिक क्रॉस बन जाता है, तो क्या आपको इस पर कोई आपत्ति है?" उन्होंने कहा, "तब तो हमें कोई आपत्ति नहीं है।" "अगर स्वस्तिक क्रॉस बन जाता है, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है।" तो स्वस्तिक, जो श्री गणेश का प्रतिनिधित्व करता है, जो हमारे भीतर चार संयोजकता वाले कार्बन परमाणु हैं, सहस्त्रार पर आकर वह क्रॉस बन जाता है। क्योंकि शीर्ष चक्र, सहस्त्रार और उसके निचले भाग के बीच में, जिसे हम विशुद्धि कह सकते हैं, वहाँ एक विशेष चक्र, अग्न्या चक्र स्थित है। और सहस्त्रार - जो कि ईश्वर का राज्य है - में प्रवेश करने के लिए, जैसा कि वर्णित है, लिम्बिक क्षेत्र, किसी को भी इस संकीर्ण द्वार से गुजरना पड़ता है और कुछ ऐसा, जो बिल्कुल शाश्वत है, उसे गुजरना था। अब आप जानते हैं कि श्री गणेश ओंकार हैं, ब्रह्मशक्ति हैं, वह शक्ति हैं, जिसे हम आत्मसाक्षात्कार के बाद महसूस करते हैं, जिसे आपने कल अपने आस-पास महसूस किया था। अब, यही एकमात्र चीज़ है जो गुज़र सकती है इस एक छोटे से द्वार से होकर, इसीलिए कहा जाता है, "मैं मार्ग हूँ, मैं द्वार हूँ।" लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा, "मैं द्वार हूँ।" लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा, "मैं गंतव्य हूँ।" उन्होंने नहीं कहा, "मैं ही मंजिल हूँ", कारण यह था कि ऐसा कहने से वे आगे की प्रगति को रोक देते। और इसीलिए उन्होंने यह नहीं कहा, "मैं गंतव्य हूँ," क्योंकि गंतव्य लिम्बिक क्षेत्र है। अब यह जानना बहुत दिलचस्प है कि लोग हर चीज़ को कैसे बरगलाने/चालाकी की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए मोहम्मद साहब के जीवन में उन्होंने स्वयं कहा है, "जब पुनरुत्थान का समय आएगा, तो आपके हाथ बोलेंगे।" कुरान में उन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है। उन्होंने बहुत कुछ लिखा है पुनरुत्थान के समय के बारे में, जो कि आज है, जिसे आप अपने हाथों में महसूस कर रहे हैं, लेकिन कोई भी इसके बारे में बात नहीं करता है। वे लोग केवल कयामत की बात करते हैं, वह समय जब सब नष्ट हो जाएंगे। वे बस उस हिस्से के बारे में बात कर रहे हैं, कि सबका विनाश होने वाला है और आपको भयभीत होना चाहिए, आपको विस्मित होना चाहिए, कि आप इन सभी मुल्लाओं के पास आओगे और इन मुल्लाओं से प्रार्थना करोगे और यह सोचकर भयभीत हो जाओगे कि कयामत गिरने वाली है। लेकिन बीच में एक पुनरुत्थान का समय है, जिसका वर्णन बहुत स्पष्ट रूप से किया गया है कुरान में, लेकिन अगर आप देखें इसका उल्लेख कहीं नहीं है। लोग इसके बारे में कभी बात नहीं करते, लोग नहीं जानते कि पुनरुत्थान का समय भी है। मोहम्मद साहब ने बहुत ही स्पष्ट रूप से इस बारे में बात की है और कहा है कि, "उस समय आपके हाथ बोलेंगे।" उन्होंने कुण्डलिनी को आसस कहा है। अब बाइबल में भी लिखा है, "मैं आपके सामने आग की लपटों के समान प्रकट होऊँगा।" ये चक्र, ये केंद्र ज्वाला की लपटों जैसे दिखते हैं। विशेष रूप से सहस्त्रार विभिन्न रंगों का एक ऐसा सुंदर संयोजन है लपटों का, जो बहुत ही हलकी गति से चलती हैं और जीवित लपटें हैं, आप उन्हें देख सकते हैं। यदि आप मस्तिष्क को काटते हैं, मस्तिष्क के अनुप्रस्थ भाग में यदि आप देखते हैं, यह कमल की पंखुड़ियों जैसा दिखता है। यह हज़ार पंखुड़ियों वाला मस्तिष्क है और आप उन हज़ार पंखुड़ियों को प्रबुद्ध देख सकते हैं, यदि आप अपना विकास उस बिंदु तक प्राप्त कर सकें, जो बिल्कुल एक खूबसूरत कमल की तरह दिखता है जिसमें नन्ही-नन्ही ज्वाला जैसी पंखुड़ियाँ हैं, जो जीवित पंखुड़ियाँ हैं और आप इस मौन और उन पंखुड़ियों की सुंदरता को देख सकते हैं। उसके द्वारा, केंद्र में, आज्ञा चक्र है, जिससे कुंडलिनी को छेदना है जो एक बहुत ही कठिन रास्ता है और किसी को इस धरती पर आकर यह दिखाना था कृष्ण ने कहा है कि, 'आपको शाश्वत जीवन जीना होगा।' इसीलिए ईसा मसीह ने अवतार लिया, वे महाविष्णु थे, उन्हें विशेष रूप से बनाया गया था - इसलिए ईस्टर के दिन वे अंडा बनाते हैं। अगर आप किसी ईसाई व्यक्ति से पूछें, "आप ईस्टर के दिन अंडा क्यों बाँटते हो," वे आपको यह नहीं बता पाएंगे। लेकिन लीग के पुराण से आपको पता चलेगा कि उन्हें सबसे पहले अंडे की तरह बनाया गया था। अब मनुष्य भी एक अंडे की तरह है क्योंकि जब वह पैदा होता है, तो धीरे-धीरे उसकी पिट्यूटरी काम करना शुरू कर देती है और उसके सिर पर बहुत अहंकार इकट्ठा हो जाता है। तो अहंकार और प्रतिअहंकार, दोनों फ़ॉन्टनेल हड्डी क्षेत्र में मिलते हैं और आपका एक कैल्सीफाइड मस्तिष्क विकसित होता है, मेरा मतलब है, वास्तव में एक डिब्बे की भांति और आप अपने 'मैं' के साथ एक व्यक्ति बन जाते हैं। जैसे, "मैं श्रीमान फलां, श्रीमती फलां हूँ, जैसे मैं यहाँ का नागरिक हूँ, और मैं ईसाई हूँ, या मैं एक हिंदू हूँ या मैं एक भारतीय हूँ। या अंग्रेज़।' आप देखिए, ये सभी, अलग-अलग पहचानें आपके अंदर आने लगती हैं और आप एक डिब्बे या अंडे की तरह बन जाते हैं। अब इस अंडे को बढ़ना है। जब वह पर्याप्त रूप से तैयार हो जाए, तभी, जैसे हम ब्राह्मण को द्विज कहते हैं - जो ब्राह्मण द्विज नहीं है, उसे अब्राह्मण कहा जाता है। शास्त्रों में उसे इस प्रकार कहा गया है, अ-ब्राह्मण - वह ब्राह्मण नहीं है, वह अ-ब्राह्मण है। उस 'अ' को दूर जाना होगा जब तक उसे आत्मसाक्षात्कार नहीं मिल जाता, तब तक वह अ-ब्राह्मण ही रहता है। इसलिए जब यह टूटता है, यह अंडा एक नए प्राणी में बदल जाता है, जब आप एक नए प्राणी बन जाते हैं, तो आपको द्विज कहा जाता है और एक पक्षी को भी द्विज कहा जाता है, अर्थात, दो बार जन्मा। लेकिन कई लोग जिनसे मैं मिली, उन्होंने कहा, "हम पहले से ही दो बार जन्मे हैं।" यह सब आत्म-प्रमाणन है, "हम दो बार जन्मे हैं।" 'दो बार जन्मे' से आपका क्या मतलब है?

आप स्वयं को प्रमाण पत्र नहीं दे सकते। यदि आप द्विज हैं, तो आपकी विशेषता क्या है? द्विज व्यक्तित्व के रूप में आपको क्या मिलता/ मिला है? सबसे पहले, आपको सामूहिक रूप से जागरुक होना चाहिए - यानि अपने केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर। हमेशा आपने जो भी विकास किया है, वह आपके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर आता है। लेकिन अब साक्षात्कार के बाद, आपके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर आपको महसूस होना चाहिए अपने स्वयं के केंद्र, सूक्ष्म केंद्र, और आपको दूसरों के केंद्रों को भी महसूस करना चाहिए। यह न्यूनतम उस व्यक्ति के साथ होना चाहिए, जो कहता है कि वह योगी है। अगर वह ऐसा नहीं कह सकता, तो वह सिर्फ़ स्वयं को एक प्रमाण पत्र दे रहा है - इस तरह/जैसे कि, आप स्वयं को प्रमाणित कर सकते हैं कि, "मैं भारत का प्रधान मंत्री हूँ," लेकिन आपकी बात कौन सुनेगा? यह स्व-प्रमाणन एक बहुत ही आसान चीज़ है, जहाँ तक ईश्वर का संबंध है और धर्म का संबंध है क्योंकि वहाँ ऐसा कोई कानून नहीं जो लोगों का सोचते हों, वास्तव में मार्गदर्शन कर सकते हैं या उन्हें जेल में डाल सकते हैं, इसलिए वे अपनी इच्छानुसार काम करते हैं। अब हमें यह समझना होगा कि इस जीवनकाल में ही एक जीवन है - आपको एक ऐसा जीवन मिलने जा रहा है जो कि बिल्कुल एक अलग आयाम में है, जहाँ आपकी आत्मा आपके चित्त के माध्यम से, आपके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के माध्यम से प्रकाशित होती है। कल बहुत से लोगों ने ठंडी हवा का अनुभव किया। अब यह ठंडी हवा क्या है? यह शीतल हवा ओंकार शक्ति है, ईश्वर की ब्रह्म शक्ति है, ईश्वर की सर्वव्यापी शक्ति है। वह शक्ति जो फूल को फल में बदल या परिवर्तित कर देती है। जब तक आप फल नहीं बन जाते, हम फल को पेड़ से अलग नहीं करते। उसी तरह, जब तक आप एक साक्षात्कारी जीवआत्मा नहीं बन जाते, तब तक आप उस अनासक्ति को प्राप्त नहीं कर सकते। जो लोग आत्मसाक्षात्कार से पहले अनासक्ति पर काम करते हैं, वे वास्तव में बहुत अपरिपक्व काम करने का प्रयास कर रहे हैं। यह काम नहीं करता। जब आप पर्याप्त रूप से परिपक्व हो जाते हैं, तभी आप अनासक्ति को पूरी तरह से महसूस कर सकते हैं और उस अनासक्ति में आप गतिशील बन जाते हैं। पेड़ के रस की तरह, यह ऊपर उठता है, और ऊपर उठता है और अपनी ऊर्जा, पोषण, हर पत्ते, हर शाखा, हर फूल, हर फल को देता है और वापस लौट आता है, किसी से आसक्त नहीं होता। ऐसे अगर कोई जुड़ जाए - हम किसी भी वृक्ष में देख सकते हैं - वह नहीं जुड़ता - वे समझदार हैं क्योंकि पेड़ और 'पशु' भगवान के 'पाश' में हैं इसलिए वे समझदार हैं - वे कभी भी आसक्त नहीं होते। लेकिन मान लीजिए कि इंसानों की तरह वे भी एक फूल या एक फल से संलग्न हो जाएँ, पूरा पेड़ मर जाएगा और वह फल भी मर जाएगा। लेकिन यह बात हमें तब भी समझ नहीं आती जब हम अपने बच्चों से बहुत ज़्यादा आसक्त हो जाते हैं। किसी एक व्यक्ति से जुड़ जाते हैं या इस या उस से जुड़ जाते हैं, भौतिक चीज़ों से जुड़ जाते हैं। लेकिन यह अनासक्ति वास्तव में आपका सच्चा स्वभाव है, जो बस कार्यान्वित होता है, जब आप आत्मा बन जाते हैं। अब आत्मा बनने के लिए आपको इस आज्ञा चक्र से गुजरना होगा। अब सहज योग में हमें पता चला है इसके लिए सबसे अच्छा मंत्र है, कि "माँ, मैं सबको क्षमा करता हूँ।" इसके लिए सर्वोत्तम मन्त्र है- 'क्षमा, क्षमा' लेकिन आज्ञा चक्र में दो पंखुड़ियाँ हैं - एक सामने और एक पीछे। यह सब इस तरह से रखा गया है। दरअसल हम कह सकते हैं कि सामने वाला हिस्सा यहाँ है और पीछे वाला हिस्सा वहाँ है। लेकिन ये सब कुछ इस तरह से काम करता है कि जब आपमें बहुत ज्यादा अहंकार हो, जब आपमें अहंकार बहुत अधिक होता है, तब आपकी एक पंखुड़ी काम करना शुरू कर देती है, जिसे हम कह सकते हैं, कि ये पंखुड़ी पिट्यूटरी की देखभाल करती है। तो जब आपमें अहंकार होता है, आप सोचते हैं, 'मैं यह करूँगा, मुझे यह करना होगा, मैं इसकी योजना बनाता हूँ, मुझे यह अवश्य प्राप्त करना चाहिए,' और महत्वाकांक्षी लोग - हम राजोगुणी कह सकते हैं। रजोगुणी जब स्वयं बहुत अधिक जोर देते हैं/दावा करते हैं, तो उनमें उनके सिर पर अहंकार सवार हो जाता है, जैसा कि मैंने आपको बताया था और दूसरे, जो जीवन के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, जो कहते हैं कि, "मुझे सहना होगा और मुझे कष्ट झेलना होगा और ऐसा ही होता है और जो हर तरह की चीजों के कुसंस्कार ग्रहण करते रहते हैं, तब आप प्रति अहंकार विकसित करते हैं और प्रति अहंकार और अहंकार दोनों ही सिर पर सवार हो जाते हैं/छा जाते हैं और इस तरह आप अंडे के खोल में कैद पक्षी बन जाते हैं। अब, जब यह कुंडलिनी आज्ञा से ऊपर उठती है, तो क्या होता है, सबसे अद्भुत बात यह होती है कि यह आरोहण तुरंत धकेलता है, धकेलता है इन दोनों गुब्बारे जैसी चीज़ों को विशुद्धि चक्र में और पूरी चीज़ अंदर सोख़ ली/शोषित हो जाती है। मैंने इस जीवनकाल में सहस्त्रार पर काम किया है और जैसा कि आप जानते हैं मैंने इसका भी अध्ययन किया है चिकित्सा और आंशिक रूप से यह और वह, बस यह समझने के लिए कि ये लोग इसे और उसे क्या कहते हैं। और इसी तरह मैं अब इसका जड़ वस्तुओं से भी सम्बन्ध जोड़ सकती हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद! अब यदि आपके पास कोई प्रश्न हैं कल जैसे, आप मुझसे थोड़ी देर के लिए पूछ सकते हैं और फिर लगभग 10 मिनट का साक्षात्कार का सत्र होगा। लेकिन समझदारी भरे सवाल पूछें। क्या कह रहे हैं? सुनाई नहीं दे रहा बहनजी। सहज योगी: वह कहतीं हैं कि माथे पर जो निशान(बिंदी) है, आपने कहा, लाल निशान बहुत अच्छा है, लेकिन उत्तर भारत में विधवाएँ इसे नहीं लगातीं। श्री माताजी: देखिए इस वैधव्य वगैरा पर हम विश्वास नहीं करते। कोई भी पुरुष विधुर नहीं होता, फिर एक महिला विधवा क्यों हो? आप देखिए कि यह महिलाओं की गलती है, जो इन सभी निरर्थक विचारों को स्वीकार करती हैं। सहज योग में हम किसी भी विधवा को ऐसे (बिना बिंदी के) आने की अनुमति नहीं देते [अस्पष्ट] सभी बेतुके विचार दिए गए हैं महिलाओं के बारे में। महिलाओं का बहुत सम्मान किया जाता है। उनका सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि वे शक्तियाँ हैं। वे शक्तिपीठ हैं। लेकिन हम महिलाओं ने खुद को ऐसा बना लिया है। हमें उसके प्रति अधीन होने की क्या ज़रूरत थी? हमने अब महिला होने की क्षमता खो दी है। महिला धरती माता की तरह होती है। वह अपने बारे में बहुत सी बातें सहन कर सकती है लेकिन बकवास नहीं। यह 'विधवा' और ऐसी ही अन्य बातें, बिल्कुल निरर्थक बाते हैं और सहज योगी इन सब बातों पर विश्वास नहीं करते। दोनों में से किसी एक को पहले मरना होता है। दोनों एक साथ नहीं मर सकते। मैं किसी ऐसे को नहीं जाना, दोनों पति और पत्नी एक साथ मर गए हों एक ही समय, एक ही स्थान पर। एक विधुर या विधवा होगा ही। केवल महिलाओं का दमन है जो कि हमारे पर आया है विभिन्न स्रोतों से और हमने उन्हें स्वीकार कर लिया है। उत्तर भारत, आप मुझे उत्तर भारत के बारे में मत बताइये। उत्तर भारत में तो शादीशुदा महिलाएँ भी नहीं लगातीं। वे विधवाओं की तरह घूमना चाहती हैं। [अस्पष्ट] वे नहीं लगातीं। मैंने देखा है, मेरा मतलब है, यह नहीं है [अस्पष्ट] अविवाहित को नहीं, और विधवा नहीं [अस्पष्ट] उनके कोई बिंदी नहीं थी, कुछ भी नहीं। वे इस सबकी अहमियत नहीं समझतीं। वे पश्चिमी लोगों या इस्लामी लोगों की तरह बनने वालीं हैं - मुझे नहीं पता कि यह किस तरह की कंडीशनिंग है। साधक: मेरा यहाँ से कुछ प्रश्न है। श्री माताजी: वह क्या कह रहे हैं? आइए सरदारजी, आइए। आप कुछ (अस्पष्ट) मुझे तो आजकल डर लगने लग गया है। कहिए हाँ यहीं बता दीजिए , यहीं से बता दीजिए, वह बता देंगे। इन से बता दीजिए, ये लोग बता देंगे। साधक: मैं समझता हूँ कि आप मानते हैं कि सभी धर्म अच्छे हैं। श्री माताजी: सभी धर्म?

साधक: अच्छे हैं श्री माताजी: अच्छे - वे सर्वश्रेष्ठ हैं। साधक: ठीक है। अब, अगर किसी का बच्चा है और कोई उसे सलाह देना चाहे और उसे स्वतंत्रता दी हो किसी भी धर्म का पालन करने के लिए, आप किस धर्म की सलाह देंगीं कि बच्चे को कौन सा धर्म बताना चाहिए? श्री माताजी: सहज योग सहज योग में आपको सभी धर्म मिलते हैं। नानक साहब ने क्या कहा है, "सहज समाधि लागो" सहज समाधि! आपको अपनी समाधि प्राप्त करनी होगी, आपको आत्मा बनना होगा अब उसके लिए समय आ गया है। इतने सारे धर्मों की कोई आवश्यकता नहीं है। सभी धर्मों का आपके भीतर सम्मान होना चाहिए क्योंकि वे सभी आपके भीतर निवास करते हैं। आप नहीं जानते कि हर धर्म हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम सभी धर्मों का सार नहीं जानते। हम बस बाहर हैं, इसीलिए। इसलिए, बच्चे को सहज योगी कहा जाना चाहिए, जो धर्मातीत हो, जो गुणातीत हो, जो कालातीत हो। औलिया की कोई जाति नहीं होती। इनसे झगडे खड़े होते हैं। प्रश्न: विभिन्न पशु रूपों में पुनर्जन्म के बारे में आपका क्या विचार है? श्री माताजी: अलग-अलग रूपों में पुनर्जन्म? सहज योग: विभिन्न पशु रूपों में। सहज योगी: मरने के बाद, मनुष्य पशु या मानव रूप में जन्म लेगा। साधक: मृत्यु के बाद का जीवन। श्री माताजी: अब आप मृत्यु के बारे में क्यों चिंतित हो, मैं तो जीवन के बारे में बात कर रही हूँ। मैं आपको बतातीं हूँ कि यह एक विशिष्ट भारतीय मानसिकता है। [अस्पष्ट] सबसे पहले वे आकर पूछेंगे, "माँ, क्या मैं पिछले जन्म में कुछ था?" फिर, "मैं क्या था?" मैंने कहा, "बाबा, आप क्यों चिंतित हैं? मेरे लिए आप मेरे बेटे हैं, बेहतर होगा कि आप अपना आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करें।" हमें वर्तमान में रहना होगा। हमें वर्तमान में रहना होगा। एक बार जब यह खत्म हो जाता है, तो भविष्य का अस्तित्व नहीं रहता। हमें वर्तमान में रहना होगा। प्रश्न: क्या प्रकृति और पुरुष एक हैं? श्री माताजी: बिल्कुल। यह चाँद और चाँदनी, सूरज और सूरज की रोशनी जैसा है। लेकिन जब प्रकृति सृजन करती है, तो पुरुष देखता है। प्रश्न: पिछले कुछ दिनों के मेरे प्रयासों के बावजूद, मेरी कुंडलिनी जागृत नहीं हो पाई है। क्या मैं अपने चक्रों को साफ़ करने के लिए आपका स्पर्श पा सकता हूँ? श्री माताजी: ठीक है। जब आप आओगे तो आपको यह मिलेगा। मैं इसके लिए कड़ी मेहनत करुँगी। हम इस पर काम करेंगे। प्रश्न: महिला संत बनना बहुत सामान्य बात है। कृपया टिप्पणी करें। श्री माताजी: मेरा मतलब है, मैं कोई संत नहीं हूँ, मैं एक माँ हूँ, बस इतना ही। मेरे लिए माँ बनना बहुत आसान है। अगर आपकी कुंडलिनी माँ है, तो मैं भी माँ हूँ। माँ बनना सबसे आसान चीज़/बात/काम है। मैं संत या ऐसा कुछ होने का दावा नहीं करती। लेकिन महिला हमेशा एक ऋषि/संत होती है इसलिए वह संन्यासी नहीं बन सकती। एक महिला का पद ऐसा ही है। एक माँ, जो बच्चे की देखभाल करती है, अपना पूरा ध्यान बच्चे पर देती है, वास्तव में वह पहले से ही संतत्व में है। लेकिन हम भारतीय, हम सोचते हैं कि केवल पुरुष ही संत बन सकते हैं; स्वाभाविक रूप से, जो लोग संत नहीं हैं, उन्हें संत बनना ही होगा। प्रश्न: क्या महिलाएं गायत्री मंत्र का जाप कर सकती हैं?

श्री माताजी: हाँ, किसी को भी बिना समझे जप नहीं करना चाहिए। अब गायत्री मंत्र का जाप उन लोगों को करना चाहिए जो जीवन में अवसादग्रस्त हैं, जो जीवन में घबराहट महसूस करते हैं, जिनका झुकाव बाईं ओर है। तो महिलाओं, कुछ महिलाओं को करना होता है। और जो पुरुष ऐसे हैं, उन्हें भी करना होगा। लेकिन जो लोग पहले से ही हवा के घोड़े पर सवार हैं उन्हें गायत्री मंत्र का जाप करना बंद कर देना चाहिए। प्रश्न: मेरा बेटा अस्थमा से पीड़ित है। मुझे क्या करना चाहिए? वह दस साल का है। श्री माताजी: ठीक है। निश्चित रूप से सहज योग बच्चे को ठीक कर सकता है। आप हमारे केंद्र पर आइए और वे लोग आपको बताएंगे कि क्या करना है। सभी व्यक्तिगत प्रश्नों को केंद्र में व्यक्तिगत रूप से सुलझाया जाना चाहिए। हम व्यक्तिगत रूप से ध्यान दे सकते हैं। हमारे यहाँ डॉक्टर हैं, हमारे यहाँ अन्य लोग हैं, वे आपकी देखभाल कर सकते हैं। प्रश्न: क्या यह वह माँ है जिसे हम कहते हैं, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत। इसलिए हम उसे क्या पुकारें? श्री माताजी: क्या यह माँ है? सहज योगी: क्या यह माँ है जिसका कोई आरंभ और अंत नहीं है, इसलिए हम इसे क्या कहें? श्री माताजी: माँ, बस इतना ही। माँ है [अस्पष्ट] प्रश्न: मुझे दो दिन से नशा सा महसूस हो रहा है, कुछ अलग सा। यह कैसा अहसास है? श्री माताजी: जब मस्त हुए फिर क्या बोलें ? प्रश्न: माथे के लिए एक चंदन बनाया गया है जो लाल नहीं बल्कि सफ़ेद है श्री माताजी: चंदन दो प्रकार के होते हैं - सफेद और लाल और लाल रंग का उपयोग उन लोगों के लिए किया जाना चाहिए जो वाममार्गी, अवसादग्रस्त हैं लेकिन जो लोग आक्रामक होते हैं, वे दाएं तरफा होते हैं। उन्हें सफेद चंदन का इस्तेमाल करना चाहिए। प्रश्न: क्या आप इस पर प्रकाश डाल सकतीं हैं कि हमने किस लिए जन्म लिया है? श्री माताजी: हम अबोध बनने के लिए पैदा हुए हैं। हम ईश्वर के नागरिक बनने के लिए पैदा हुए हैं [अस्पष्ट] उनके साम्राज्य में प्रवेश करने के लिए, इन सभी आशीर्वादों और महिमाओं का आनंद लेने के लिए। एक बहुत कृपापूर्ण पिता की तरह, उन्होंने आपको आमंत्रित किया है और वह अपने बच्चों के लिए वह सब कुछ देना चाहते हैं जो संभव है। सहज योगी: दिल्ली के सभी सहज योगियों की ओर से हम आपको सादर आमंत्रित करते हैं 20 तारीख को श्री माताजी का जन्मदिन मनाने के लिए। यह बहुत सम्मान की बात है कि श्री माताजी ने कुछ और दिन रुकने पर सहमति जताई है ताकि हम इस शुभ अवसर पर उपस्थित रह सकें। आप सभी आमंत्रित हैं और हम आशा करते हैं कि आप सभी आएंगे और दूसरों को भी साथ लेकर आएंगे और इसे एक बड़ी सफलता बनाएंगे। धन्यवाद! अब श्री माताजी आत्मसाक्षात्कार देंगी। [तालियाँ] प्रश्न: माँ, आपने कुंडलिनी जागरण के बारे में बताया है लेकिन इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? मैं इसका प्रैक्टिकल चाहता हूँ। श्री माताजी: ठीक है, अब हम इसे करेंगे - प्रैक्टिकल। अब जो लोग खड़े हैं, वे बैठ सकते हैं, आगे आकर बैठ सकते हैं। सभी को बैठ जाना चाहिए। आप आराम से बैठ जाएँगे। कृपया आराम से बैठिए। पहाड़ की जैसी कुण्डलिनी उठानी पड़ती है - करें क्या ?

हाँ। यह एक बहुत ही सरल प्रक्रिया है। जैसा कि मैंने आपको बताया कि हमारे पास तंत्रिका तंत्र की सिरायें हैं इन पाँच अंगुलियों पर, छह और सात केंद्र बाईं ओर और उसी तरह, पाँच, छह और सात केंद्र। अब जब आप अपने हाथ इस तरह रखते हैं, चैतन्य जाता है, गुजरता है आपके तंत्रिका तंत्र की सिराओं से और सूचित करता है, जैसा कि मैंने आपको बताया, श्री गणेश को मूलाधार (चक्र) पर। इसके परिणामस्वरूप कुंडलिनी ऊपर उठती है। उसके लिए, बहुत सरल है, आप मेरे साथ थोड़ा सा सहयोग करें थोड़ा सा और यह कार्यान्वित होगा। यह किसी पर भी कार्य कर सकता है। इसमें उम्र की कोई समस्या नहीं है, बिल्कुल भी कोई समस्या नहीं है। यह बहुत आसानी से काम करता है। अब सबसे पहले अपने जूते उतर लीजिए - यह सहायक है क्योंकि ये धरती माता ही वो है जो हमारे भीतर प्रतिनिधित्व करती है कुण्डलिनी स्वरुप त्रिकास्थि अस्थि(सेक्रम बोन) में। कृपया अपने जूते निकालें और अपने हाथ मेरी ओर रखें। अब मैं जो आपको बता रहीं हूँ, उसका पालन करने का प्रयास कीजिए। यह अत्यंत सरल है, लेकिन समझने की कोशिश कीजिए। बहुत सरल है। सबसे पहले आपको अपनी धरती माँ या भारत की इस योग भूमि का धन्यवाद करना होगा आपको इस महान देश में जन्म देने के लिए और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वह आपके साक्षात्कार के इस समय में आपको आशीर्वादित करें। इसलिए, उस प्रार्थना में पूर्ण ह्रदय से, आप तीन बार उनका आशीर्वाद मांगें। तीन बार अपनी मातृभूमि के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आप उनसे आशीर्वाद माँगें कि, "हे माँ इस समय जब कि हमारा मोक्ष का क्षण है, आप हमें आशीर्वादित करिए।" ऐसे तीन बार कहें - पूर्ण ह्रदय से। अब सीधी बात और एक है, कि हमें अपने अंदर बसा हुआ इनोसेंस(अबोधिता) जो है, जो कि श्री गणेश के रूप में है, उससे संरक्षण माँगना होगा। इससे ये कहें कि, "हे गणेश, हे श्री गणेश, आप इस मोक्ष क्षण में हमारा संरक्षण करिए।" तीन बार कहें। कृपया श्री गणेश से प्रार्थना करें कि, "हे श्री गणेश, हमारे उत्थान के इस समय में, कृपया मेरी रक्षा करें।" इसे तीन बार कहें। अब अपना बायाँ हाथ आराम से अपनी गोद में रखें। बायाँ हाथ इच्छा शक्ति दर्शाता है, इच्छा की शक्ति, कि आपकी इच्छा अपने आत्म-साक्षात्कार की है और दाहिना हाथ अपने हृदय पर। दाहिना हाथ आपकी क्रिया शक्ति दर्शाता है, जो कार्य करने की शक्ति है। इसलिए बाँया हाथ आराम से अपनी गोद में रखना चाहिए। अपने गोद में लेफ्ट हैंड आप आराम से रख लीजिए। इससे इच्छा शक्ति प्रदर्शित होगी। और राइट हैंड अपने ह्रदय पे रख लें। इस ह्रदय में आत्मा का वास है। और राइट हैंड जो है वो क्रिया शक्ति प्रदर्शित कर रहा है। ह्रदय पे रख कर के आप पूर्ण विश्वास से एक सवाल पूछें, मन में पूछें कि, "माँ क्या मैं आत्मा हूँ?" बहुत से लोग जो पहले से आ रहे हैं, उनको आलरेडी हाथ में ठंडक हवा आ रही है। लेकिन तो भी मैं कहूँगी कि सब लोग पैर ज़मीन पर रखें तो अच्छा रहेगा, क्योंकि माँ की बड़ी मदद होती है इसमें। "क्या मैं आत्मा हूँ। माँ, क्या मैं आत्मा हूँ?" अब अपने ह्रदय में प्रश्न करें, "माँ, क्या मैं आत्मा हूँ?" कृपया यह प्रश्न तीन बार पूछें। यह सिर्फ आपके मन को साफ़ करने के लिए है। यह कंप्यूटर के पोर्ट की तरह है। जब आप कंप्यूटर से सवाल पूछते हैं, तो जवाब आ जाता है। तो, सवाल पूछिए। जो लोग अति सक्रिय हृदय रोग से पीड़ित हैं और उससे होने वाली सभी बीमारियों से, उन्हें हमेशा इसे मंत्र की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, "माँ, मैं आत्मा हूँ।" अब इस दाहिने हाथ को बायीं ओर पेट पर रखें। अब यहाँ गुरु तत्त्व का चक्र कार्य करता है। गुरु तत्व, आपके भीतर गुरु का सिद्धांत आपके पेट के बाईं ओर पर कार्य करता है। चूँकि आप आत्मा हैं, इसलिए आपको अपना गुरु स्वयं बनना होगा। इसलिए आपको कहना होगा, "माँ, क्या मैं अपना गुरु स्वयं हूँ?" अब राइट हैंड अपने पेट पर आप लेफ्ट साइड में रख लीजिए। और इसके बाद आप ये सवाल पूछिए कि, "माँ क्या मैं स्वयं का गुरु हूँ?" क्योंकि ये गुरु तत्व का सेंटर है, उसका केंद्र है; और क्योंकि आपने पहला सवाल पूछा था, कि क्या आप आत्मा हैं। आपने उसी के क्रमुक आपने जो दूसरा सवाल है वो पूछा कि, "माँ क्या मैं स्वयं का गुरु हूँ?" ये तीन बार पूछिए। इसके पूछने के बाद आप इस राइट हैंड को फिर नीचे की तरफ ले जाएँ। पेट पर नीचे की तरफ रखें। इस जगह जो स्वाधिष्ठान चक्र है, जो स्वाधिष्ठान चक्र है, वो यहाँ पर शुद्ध विद्या प्रदान करता है, आपको शुद्ध विद्या देता है। शुद्ध विद्या वो विद्या है जिससे आप परमात्मा का दिया हुआ ये जो आशीर्वाद है, जो आपका आत्मसाक्षात्कार है, उसे आप प्लावित कर सकते हैं, उसे आप इस्तेमाल कर सकते हैं। आप ये जान सकते हैं कि परमात्मा के कायदे-कानून क्या हैं। इसी एक शुद्ध विद्या से ही आप सारा परमात्मा के बारे में सारा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। शुद्ध विद्या माने वो तकनीक, वो तंत्र जिससे आप ये जान लें कि परमात्मा की शक्ति क्या है और उसे किस तरह से इस्तेमाल करना चाहिए। इसीलिए इसे शुद्ध विद्या कहते हैं। क्योंकि बिल्कुल ये अब्सोल्यूट है, एकांकी है, इससे दूसरा कोई उसका पर्याय नहीं है - पर्याय रहित। पेट के निचले हिस्से पर हाथ रखकर आपको कहना है, "माँ, कृपया मुझे शुद्ध ज्ञान, शुद्ध विद्या दीजिए।" शुद्ध विद्या का अर्थ है शुद्ध ज्ञान, अर्थात ज्ञान ईश्वर की ऊर्जा के सभी नियमों और विनियमों के बारे में, उस ऊर्जा को संभालने की सभी तकनीक और आत्मा के बारे में सारा ज्ञान - शुद्ध विद्या है, इसलिए कृपया छह बार कहें, "माँ, मुझे शुद्ध विद्या दीजिए, मुझे शुद्ध ज्ञान दीजिए।" आप भी कहें, "कृपया माँ मुझे शुद्ध विद्या दीजिए," छह बार। ये आपके माँगे बगैर मैं ज़बरदस्ती नहीं कर सकती। मैं इसके लिए आपसे ज़बरदस्ती नहीं कर सकती क्योंकि आप स्वतंत्र हैं। आप स्वतंत्र हैं। आप जब तक इसे माँगेगे नहीं, मैं ये दे नहीं सकती, सो कहिए, "माँ मुझे आप शुद्ध विद्या दीजिए।" छह बार कहिए क्योंकि इसके छह, इसकी छह कलियाँ हैं। इस चक्र की छह कलियाँ हैं इसलिए इसे छह बार कहिए। अब इसके बाद हम लोगों को अपनी कुण्डलिनी पर प्रभाव डाल सकते हैं और अलग अलग एक एक चक्र को खोलते हुए हम ऊपर जा सकते हैं। सब काम लेफ्ट साइड में होगा। अब आपको बाएं हाथ की ओर काम करना होगा और अब आप कुंडलिनी के आरोहण को नियंत्रित कर सकते हैं। तो अब आप गुरु तत्व के बाईं ओर, पेट पर, अगले चक्र की ओर चलें। इस समय आप पूर्ण विश्वास के साथ कहें कि, "माँ मैं अपना स्वामी हूँ, मैं अपने स्वयं का गुरु हूँ।" इसे दस बार कहें क्योंकि गुरु के दस सिद्धांत हैं। अब अपना पूरा चित्त इस पर लगाएँ। दस मर्तबा आप कहिए पूर्ण विश्वास के साथ कि, "माँ, मैं स्वयं का गुरु हूँ।" इस वक्त आप अपना हाथ गुरु तत्व के चक्र पे रखें, जो कि लेफ्ट हैंड आपने लेफ्ट साइड में पेट पर ऊपर की ओर रखा हुआ है। अब इस हाथ को आप ह्रदय पर ले जाएँ। ह्रदय पर ले जा कर के, यहाँ पर आपको पूर्ण विश्वास से अब कहना होगा कि, "माँ, मैं आत्मा हूँ।" कृपया अपने हृदय पर हाथ रखें और पूर्ण विश्वास और अपने आप पर पूरा यकीन रखते हुए कहें कि, "माँ, मैं आत्मा हूँ।" कृपया इसे बारह बार कहें क्योंकि इस केंद्र में बारह पंखुड़ियाँ हैं। बारह मर्तबा आप कहिए कि, "माँ मैं आत्मा हूँ।" अब बारह मर्तबा पूरे मन से कहें। आप अगर आत्मा हैं तो आप निर्दोष हैं। बहुत से लोग अपने तो बहुत दोषमय समझते हैं। हर समय दोष अपने निकालते रहते हैं अपने को नीचे गिराते हैं और कहते हैं कि, "मैंने ये दोष किया वो दोष किया।" इससे आपकी लेफ्ट नाभि पकड़ जाती है जिससे एनजाइना जैसी बीमारियाँ होतीं हैं। इसलिए अब आप अपना हाथ उठा करके लेफ्ट विशुद्धि पर रखें सामने की तरफ से यहाँ पर जहाँ पर कि आपका कन्धा और गर्दन मिलते हैं। ज़ोर से वहाँ पकड़ें, उँगलियाँ पीछे की ओर ले जाएँऔर ज़ोर से पकड़ कर के खींचें। इस जगह आपको ये कहना चाहिए सोलह मर्तबा, क्योंकि श्री कृष्ण का ये लेफ्ट साइड है कि, "माँ, मैं आत्मा हूँ और मैं निर्दोष हूँ।" पूरे विश्वास के साथ कहिए। सोलह मर्तबा। पूरा विश्वास रखिए क्योंकि परमात्मा जो है वो प्रेम का सागर है, आनंद का सागर है, दया का सागर है, पर सबसे अधिक वो क्षमा का सागर है। वो क्षमा का सागर है - रेहमत, रहीम। हाँ! सोलह मर्तबा कहें। कृपया सोलह बार कहें कि, "माँ, मैं आत्मा हूँ और मैं दोषी नहीं हूँ।" कृपया सोलह बार कहें, "माँ, मैं आत्मा हूँ और मैं दोषी नहीं हूँ।" अब, अपने दाहिने हाथ को माथे पर तक उठाएँ और आड़ा रखें । अब, यहाँ आज्ञा चक्र है। अपना माथा दबाएँ। अब कहें, "माँ, मैं सबको क्षमा करता हूँ।" यह कहते समय आपको याद रखना चाहिए, सबसे पहले आपको खुद को माफ़ करना होगा। आप कहें, "माँ, मैं सबको माफ़ करता हूँ, मैं सबको क्षमा करता हूँ।" इस हाथ को ऊपर उठा करके अपने भाल प्रदेश पर संभाल रखें। संभाल - पूरी तरह से पकड़ के। अपना हाथ सर पे, माथे पर इस तरह से रखें जैसे आड़ा और उसको दबा कर माथे को पकड़ें और इस जगह आप कहें कि, "माँ, मैंने सब को क्षमा कर दी है।" बहुत से लोग कहते हैं कि, "माँ क्षमा करना बहुत कठिन है," लेकिन अगर आप क्षमा नहीं कर रहे हैं, तो आप अपने को ही तो तकलीफ दे रहें हैं। ये समझ लेना चाहिए, इसलिए कृपया कहिए कि, "माँ, मैंने सब को क्षमा कर दी है।" अब ये हाथ आप पीछे की ओर ले जाएँ, जो सर को पकड़ लीजिए पीछे से। पीछे में जो हिस्सा बाहर की ओर काफी निकला हुआ रहता है, उसे आप पकड़ लें। कृपया अपना हाथ अपने सिर के पीछे रखें और उसे बहुत कसकर पकड़ने का प्रयास करें। अब आप निर्दोष हैं, बिल्कुल निर्दोष हैं लेकिन आपको ये कहना होगा कि, "मुझसे अगर कोई गलती हो गयी हो, तो परमात्मा मुझे क्षमा करें।" ऐसे तीन बार कहें। आप हालाँकि निर्दोष हैं, उसमें कोई दोष नहीं, पर अगर कोई गलती हो गई हो तो उसे क्षमा कर दें। पूर्ण ह्रदय से कहें। नतमस्तक होकर के नम्र भाव से कहें। जब आप अपना हाथ सर के पीछे रखें आपको कहना होगा ईश्वर से, "अगर मैंने कोई गलती की हो तो कृपया मुझे माफ़ कर दें।" सर्वशक्तिमान ईश्वर से आपको क्षमा मांगनी होगी, लेकिन आप दोषी नहीं हैं, आप दोषी नहीं हैं। इसके बारे में दोषी महसूस मत करें। बिना दोषी महसूस किए बस इतना ही कहिए। अब, सिर के ऊपर, अपना हाथ रखें, दाहिना हाथ अपने सिर के ऊपर, फॉन्टानेल हड्डी क्षेत्र पर रखें और हथेली से दबाएँ और इसे दक्षिणावर्त दिशा में घुमाएँ। अब अपने तालू पर अपना हाथ रखें। हाथ का मतलब ये है कि हथेली और उसको आप इस तरह से दबाइए और घुमाइए जैसे कि घडी के काँटे घूमते हैं। इसको घुमाते वक्त यहाँ सात चक्र हैं, जिसके बारे में मैं बताऊँगी परसों आपसे, जो सहस्त्रार है। इस सात चक्रों के लिए आप सात बार कहिए कि, "माँ मुझे आत्मसाक्षात्कार दीजिए।" यहाँ पर भी मैं रुक जातीं हूँ, क्योंकि मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं कि आपकी स्वतंत्रता को लाँघ जाऊँ। जो आदमी स्वयं स्वतंत्र नहीं है, वो परमात्मा का तंत्र नहीं जान सकता और वो पूरी स्वतंत्रता भी उपभोग नहीं कर सकता। इसलिए पूर्ण स्वतंत्रता में आपको कहना चाहिए कि, "माँ मुझे आप यहाँ पर आत्मसाक्षातकार दीजिए।" कृपया आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रार्थना करें। मैं आपकी स्वतंत्रता को लाँघ नहीं कर सकती। इसलिए आपको इसे माँगना होगा, "माँ कृपया मुझे आत्म-साक्षात्कार प्रदान करें।" कृपया अपना हाथ घड़ी की दिशा में घुमाते हुए इसे सात बार बोलें। [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] [श्री माताजी माइक में फूँक मारतीं हैं] अब अपने हाथों को इस तरह एक साथ रखें। सोचें नहीं, सोचें नहीं। अब अपना बायाँ हाथ अपने सिर के ऊपर रखें और देखें कि क्या, ऊपर रखें अधांत्री, सर के ऊपर, अधांत्री रखिए। और फॉन्टानेल हड्डी के क्षेत्र के पास दबाकर देखें, हिलाते हुए, अगर आपको सिर में से ठंडी हवा आ रही है। क्या यह बह रही है? जरा कोशिश करिए। ऊपर मत रखिए। जो लोग आज ही आये हैं, उनको शायद नहीं महसूस हो लेकिन अधिकतर लोगों को होगा। ज़रा सा ऊपर। अब दूसरा हाथ करके देखें। हाँ! देखिये, आराम से। सूक्ष्म है, बहुत सूक्ष्म है। बहुत सटल है। इसलिए आँख बंद करके चित्त यहाँ लाएँ। इस जगह और देखें, आ रहा है क्या ठंडा-ठंडा ?

सोचिए नहीं। हम्म, आ रही है। सहज योगी: वे इसके बारे में सोच रहे हैं। श्री माताजी: इसके बारे में सोचिए नहीं, निर्विचार रहें। आप निर्विचार स्थिति में जा सकते हैं अब। क्योंकि आज्ञा चक्र को लाँघ गई कुण्डलिनी। आप निर्विचारिता में देखें। मेरी ओर देखें और निर्विचार रहें। निर्विचार रह कर के आप यहाँ चित्त रखें। चित्त यहाँ रखें और देखिए। विचार नहीं करिए। हम्म! ठीक है? अब दोनों हाथ ऊपर करें इस तरह से और एक सवाल पूछिए अपने मन में कि, "क्या माँ ये ब्रह्म शक्ति है?" मन में पूछें, "क्या ये ब्रह्मशक्ति है जो सारा जीवंत कार्य करती है?" कृपया यह प्रश्न पूछें, "माँ, क्या यह जीवंत परमात्मा की जीवंत शक्ति है, जो सभी जीवित कार्य करती है?" तीन बार पूछिए निर्विचार में। हाँ! अब दोनों हाथ सामने करके देखिए। आ रही ठंडक हाथ मैं? आ रही है? साधक: हाँ जी आ रही है। श्री माताजी: किसी-किसी के लेफ्ट हैंड में आएगी, किसी-किसी के राइट हैंड में, क्योंकि संतुलन नहीं होता है। इसलिए जिसको लेफ्ट हैंड में आ रही है, वो राइट हैंड हमारी ओर करें। राइट हैंड हमारी ओर करें और पेट पे अपना हाथ रखें। थोड़ी देर में राइट हैंड में आने लग जाएगी जिनके लेफ्ट हैंड में नहीं आती, वो लेफ्ट हैंड हमारी ओर करें और राइट हैंड ह्रदय पे रखें। लेफ्ट हैंड करें। अब आपको इतना बताना है कि आप अपनी कुण्डलिनी किस तरह से जागृत खुद कर सकते हैं और उसको मेन्टेन कर सकते हैं और इसके अलावा आपको सेण्टर पर आना होगा क्योंकि सहज योग जो है, ये सामूहिक चेतना का कार्य है, ये विराट का कार्य है। ये इसे कि मैक्रोकोस्म का माइक्रोकस्म से सम्बन्ध जोड़ना है। इसके लिए सामूहिक तरीके से होता है। अगर घर में आप बैठें और कहें कि, "माँ मैं करता था और सब खो गया," सो फिर मैं सुनने नहीं वाली। आप लोग सेण्टर में आइए, इसे प्राप्त करें और उसमें गहरे उतरें। 'जिन खोजा तिन पाइयाँ' ऊपरी तरीके के लोगों के लिए सहज योग नहीं है। जो गहनता से उतरना चाहते हैं, उन्हीं के लिए सहज योग है। रामदास स्वामी ने कहा है, 'एड़िया गबाडया ते काम नोहे।' ऐसे वैसे लोगों का ये काम नहीं है। अब आख़री बार मैं आपको बता देती हूँ कि किस तरह से अपने कुण्डलिनी का जागरण आप ख़ुद कर सकते हैं। पहले तो आपको अपने को बंधन देना होगा, जिसे कि कवच कहते हैं, या कहिए माँ का आँचल, जिससे संरक्षण हो किसी भी दुष्ट प्रवृत्ति से। तो लेफ्ट हैंड हमारी ओर करें और राइट हैंड उठा कर के अपने सर पर से इस तरह से बंधन लिया जाता है। एक, फिर नीचे, ये पहले चक्र के लिए , फिर दूसरा सर पर से लीजिएगा - इसका पूरा अर्थ आपको बता देंगे फिर तीसरे चक्र पे, फिर चौथे चक्र पे, फिर पाँचवे चक्र पे, फिर छटे चक्र पे, और फिर सातवे चक्र पे। इस तरह से आपने पहले अपने को बंधन में ले लिया। उसके बाद कुण्डलिनी के सामने इस तरह से लेफ्ट हैंड रखा जाता है। लेफ्ट हैंड - मैं भी इंटोक्सिकेटेड हो गयीं हूँ आजकल। लेफ्ट हैंड रखिए। और राइट हैंड जो है उसको इस तरह से घुमाना चाहिए कि ऊपर, सामने, नीचे, पीछे। इस तरह से कायदे से। देखिये, अब इस तरह से कुण्डलिनी उठाई जाती है; ये हाथ सीधा चलता है और ये राइट हैंड उस पर ऐसा घूमता है। लेफ्ट हैंड की तरफ चित्त रहे और राइट हैंड से उठाइये। ऊपर की ओर - उठाइये, उठाइये, उठाइये। अब कन्धों को ढ़ीला छोड़ के, सर को ढ़ीला छोड़ के, एक बंधन (अस्पष्ट - व्यष्टन) दीजिए। बाँध दीजिए। अब फिर से, फिर से ऊपर, फिर से ऊपर- दो। तीसरे मर्तबा - तीन। तीन मर्तबा बाँधें। [ ASIDE - राइट स्वाधिष्ठान बहुत है -] देखिए अब हाथ में आ रहा है कि नहीं ठंडा। दिल्ली में राइट स्वाधिष्ठान बहुत है। उसका कारण ये है कि बहुत आदमी सोचते हैं, प्लानिंग करते है, जो बिल्कुल बेकार है। दिमाग अपना आगे दौड़ाते रहते हैं। अब जैसे बैठे-बैठे लोग सोच रहे हैं कि अब कौन सी बस मिलेगी, कौन सी ट्रैन मिलेगी, कैसे जाएँगे, क्या करें। इस वक्त आप यहाँ बैठे हैं। एक क्षण भर के लिए आप वर्तमान में आइए। हाँ! आ रही ठंडक सी हाथ में?

विचार नहीं करना। विचार से परे, निर्विचारिता के परे। [एक तरफ - यह बेहतर है - दायाँ स्वाधिष्ठान] राइट स्वाधिस्ठान अगर बहुत चल रहा हो, तो आपको लेफ्ट से उठाकर राइट में छोड़ना चाहिए तीन बार। एक, दो और तीन। जितने भी बड़े-बड़े सोचने वाले लोग हैं ऐसा करिए - एक, दो और तीन। राइट स्वाधिष्ठान जिनका चलता है उनको डायबिटीज की बीमारी हो सकती है, लिवर की बीमारी हो सकती है, किडनी की बीमारी हो सकती है, लुकेमिया हो सकता है और उन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर हो सकता है, किडनी ट्रबल हो सकता है, और ये सब नहीं हुआ तो उनको हार्ट ट्रबल हो सकता है। साइटिका हो सकता है राइट साइड का। हाँ! और नींद नहीं आती है ऐसे लोगों को, सो नहीं सकते रात में। हाँ, ठीक है अब हालत? कुछ पैसे भी मूड ठीक करते हैं। सोचिए मत, सोचिए मत - क्या सोचना है? बगैर सोचे ही सब जाना जाता है, निर्विचार में। हाँ! सब को क्षमा कर दीजिए, सब को क्षमा कर दीजिए। सब को क्षमा करिए आज्ञा चक्र पे आ गई है। हाँ ! [अलग से - अगर यह अंदर शोषित हो जाए। बेहतर?] सहज योगी: हाँ। श्री माताजी: हम्म, शोषित हो गया। बोझा जो है बेकार सब लोग लिए हुए हैं। जैसे कि किसी देहाती से कहा गया कि, "तुम प्लेन में जाते वक्त इतना बोझा मत ले जाओ," तो अपने सर पर ले कर बैठ गया। इसी प्रकार आप भी बोझा लिए सर पे बैठे हैं। करने-धरने वाले तो सब दूसरे ही हैं। हाँ! करता और भोक्ता दूसरे ही हैं। आप बेकार में ही परेशान हैं। आ रही हाथ में ठंडक? कितने लोगों के हाथ में ठंडक आ रही है? हाथ में या सर में?

हाथ ऊपर उठाएँ - दोनों हाथ। अधिक लोगों के आ गई है - अधिकतर। सरदारजीयों के पहले आनी चाहिए। निराकार की बात जिसने की उसको पहले वाईब्रेशन्स मिलना चाहिए। ठीक है। [तालियाँ] सहज योगी: आप सब लोग बैठे रहें अभी आगे कोई न आये। थोड़ी देर में श्री माताजी जायेंगीं, फिर आप। जिन लोगों को देखना है, स्टेज पर आ जाएँगे, सहज योगी देख लेंगे।आप बैठे रहिए आराम से। सहज योगी: कृपया जो लोग आज ही आये हैं, वो श्री माताजी का फोटो ले लें, ताकि फोटो से ही

New Delhi (India)

Loading map...