Public Program

Public Program 1979-03-11

Location
Talk duration
68'
Category
Public Program
Spoken Language
English, Hindi, Marathi

Current language: Hindi, list all talks in: Hindi

The post is also available in: English, French.

11 मार्च 1979

Public Progam

Public Program

University of Delhi, New Delhi (भारत)

Talk Language: Hindi | Transcript (Hindi) - Draft

सवेरे 4 बजे से ही काम शुरू हो जाता है, उसके बाद खत्म होते-होते आज घर से देर हो गई है।

कल मैंने आपसे बताया था कि मैं आपको कुण्डलिनी के बारे में बताऊँगी।

ये सबको दिखाई दे रहा है क्या चार्ट? जिनको नहीं दिखाई दे रहा, इस तरह से बैठ जाएँ - इधर आ जाएँ ज़रा, ठीक से बैठ जाएँ।

कृपया ये इधर आ जाइए। जिनको नहीं दिखाई दे रहा, ज़रा इधर सरक जाएँ।

[ENGLISH - यह दिखने जा रहे हैं (अस्पष्ट)]

[अस्पष्ट बातचीत]

[अस्पष्ट बातचीत] हाँ

[अस्पष्ट बातचीत]

ज़रा बैठिए, अब आप देखिए, सामने बैठ जाइए। हाँ, ठीक है।

एक तरफ चले आइए, एक ओर।

मैंने आपसे कल बताया था कि मानव जिस प्रकृति से बना है, उस प्रकृति ने अपने अंदर बड़े कमाल के काम कर रखे हैं और इसी कारण हम बनाए गए हैं।

जो अब बात कहने वाली हूँ, उसके बारे में हमारे आज के जो आधुनिक शास्त्र हैं, इसमें कोई विवरण नहीं है। जैसे कि मैंने बताया था कि आजकल के आधुनिक शास्त्र, जो कुछ भी इस दृष्टि को गोचर होता है, जो भी इस दृष्टि से देखा जाता है साक्षात, उसे ही जानते हैं। और यह जो दृष्टि मानव की है, इसमें अभी आत्मा का प्रकाश नहीं आया है - मनुष्य अभी प्रबुद्ध नहीं हुआ। प्रबुद्ध होने के बाद ही वो सब चीज़ें जो मैं बता रही हूँ, वो जान लेगा। यह चीज़ें हमारे अंदर हैं या नहीं, यह भी आप लोग ख़ुद अपनी आँख से भी देख सकते हैं।

पहली तो चीज़ यह है कि मानव पहले स्थित होता है, उसका अस्तित्व बनता है। सारी सृष्टि की भी पहले स्थिति बनती है। अगर उसकी स्थिति न बने तो हो ही नहीं। ये जो स्थिति बनती है, यह हमारे अंदर जिस परमात्मा की शक्ति से बनती है, उस शक्ति को हम लोग सदाशिव की शक्ति कहते हैं या शिव की शक्ति कहते हैं। इस शक्ति से हमारा अस्तित्व बनता है (एक्सिस्टेंस)। इस शक्ति का नाम ऋषि-मुनियों ने महाकाली दिया था। यह शक्ति हमारे अंदर राइट साइड से गुज़र कर लेफ्ट साइड को निकल आती है। जैसे कि यहाँ दिखाया गया है - (आप दिखाइए, इड़ा नाड़ी का पथ, इधर आओ, यह, वह दिखाओ)। इसे वहन करने वाली जो नाड़ी है, जो चैनल है, उसे इड़ा नाड़ी कहते हैं। अब यह सब चीज़ें जो हैं, ये सूक्ष्म चीज़ें हैं, सटल चीज़ें हैं, यह बाह्य में दिखाई नहीं देतीं। लेकिन इसी नाड़ी से हमारे अंदर जो लेफ्ट सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम (बायाँ अनुकंपी तंत्रिका तंत्र) है, उसका प्रादुर्भाव होता है, वो मैनिफेस्ट होता है - लेफ्ट सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम। इसी प्रकार जैसे कि स्थिति होती है, जिस तरह से हमारा अस्तित्व होता है, अस्तित्व का न रहने पर हम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसका मतलब यह है कि, यही शक्ति जब नष्ट हो जाती है, तो हमारा संहार हो जाता है। इसीलिए इसे बहुत से लोग संहार शक्ति के नाम से भी जानते हैं।

जैसे जब सूर्य लय हो जाता है तो अंधकार हो जाता है, उसी प्रकार इसका। जैसे कि, एक शक्ति का न होना और होना, दोनों एक ही शक्ति का द्योतक है, इस शक्ति को स्थिति और लय, दोनों के ही द्योतक कहना चाहिए।

दूसरी जो शक्ति हमारे अंदर विचरण करती है, जिससे कि हम सृजन, क्रिएट करते हैं, जिससे हम सोचते हैं, जिससे शरीर की चालना करते हैं, शरीर को हम चलायमान रखते हैं, इस शक्ति को ब्रह्मदेव की शक्ति कहते हैं और इस ब्रह्मदेव की शक्ति का नाम है महासरस्वती। यह शक्ति हमारे - (मैं इसलिए अंग्रेजी में कह रही हूँ कि हिंदी भाषा में इससे कन्फ्यूजन हो जाता है लेफ्ट साइड से) - यह हमारी लेफ्ट साइड से गुज़र कर और राइट साइड में आ जाती है। यह शक्ति वहन करने वाली जो नाड़ी है, जो सूक्ष्म नाड़ी है, अति सूक्ष्म नाड़ी है, इसे पिंगला नाड़ी कहते हैं।

जो पहली नाड़ी है, उसे चंद्र नाड़ी भी कहते हैं और इसे सूर्य नाड़ी भी कहते हैं।

इस नाड़ी से हमारे अंदर राइट सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम (दायाँ अनुकंपी तंत्रिका तंत्र) - ये तो सूक्ष्म नाड़ी है, लेकिन जो जड़ नाड़ी है, जो आँखों में को दिखाई देती है और जो कार्यान्वित है, वो राइट सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम उसका प्रादुर्भाव है। इस नाड़ी से, मैंने आपसे बताया, कि हम शारीरिक कार्य तथा मानसिक कार्य, जिससे हम सोचते हैं, विचारते हैं, वो होता है।

पहली जो नाड़ी है, जिसे हम चंद्र नाड़ी कहते हैं या इड़ा नाड़ी कहते हैं, इससे हमारा सुप्त चेतन कार्यान्वित रहता है, जिसे सबकॉन्शियस (अचेतन) कहते हैं लोग। जैसे आज आप मेरी बातचीत सुन रहे हैं, इस वक्त आप वर्तमान में मेरी बात सुनते हैं और फ़ौरन उसे सुप्तचेतन में डाल देते हैं। कॉन्शियस माइंड से आप सुन रहे हैं और कॉन्शियस माइंड से आप सबकॉन्शियस में इसे डाल देते हैं। और इसी, इसी मन की वजह से आपके अन्दर संस्कार होते हैं - चाहे वह सुसंस्कार हों, चाहे वो कुसंस्कार हों, जिससे कंडीशनिंग ऑफ़ द ब्रेन होता है।

इसी से हमारा गत होता है, भव होता है माने जो कुछ हमारी बीत गयी, पास्ट, वो होता है - जिसे हम भूतकाल कहते हैं। सारा जो कुछ बीत गया है, वह हमारे इसी नाड़ी के कारण संग्रहित होते रहता है। और उसी का बहुत ही अति सूक्ष्म रिकॉर्डिंग या संकलन इस कुण्डलिनी में होता है। कुण्डलिनी शक्ति, यह महाकाली शक्ति का ही अवशेष है। सदाशिव की शक्ति जो है यह हमेशा स्थित है, जैसे कि एक बीज होता है। इसी बीज में से यह दोनों शक्तियाँ जागृत होतीं हैं और अंत में इसी में लय हो जातीं हैं और इसीलिए उसे सदाशिव कहते हैं। क्योंकि वो शक्ति हमेशा स्थित रहती है, उसमें से दूसरी शक्तियाँ जागृत हो करके फिर उसी में लयमान हो जातीं हैं। इसके अलावा बीचों बीच हमारे अन्दर एक और शक्ति निहित है जिसे वहन करने वाली नाड़ी को सुषुम्ना नाड़ी ऐसे कहते हैं - कोई सुषुम्ना कहते हैं कोई (अस्पष्ट) कहते हैं तरह तरह से इसके प्रोनन्सिएशन्स हैं लेकिन सुषुम्ना इसका सही माने में प्रोनन्सिएशन है जो कि आप मंत्र में भी उच्चारण कर पायेंगे। यह सुषुम्ना नाड़ी जो है यह वहन करती है हमारी उत्क्रांति की सीढ़ी - एवोलुशनरी प्रोसेस। इसी नाड़ी के कारण हम अमीबा से इंसान बने हैं। इन तीनों नाड़ियों से भी जो कुछ घटित होता है, जो कुछ बन पड़ता है, जो कुछ जीव हासिल करता है, जो कुछ पाता है, वह हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्टम (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र) पे रहता है, जो पीछे की ओर हमारे दिमाग से नीचे की ओर उतरती है।

आज जो मानव की चेतना है, जैसे आज आप हैं, वास्तविक में जो आपने पाया हुआ है, वो आपके सेंट्रल नर्वस सिस्टम में, आपके कॉन्ससियस माइंड में, पूरी तरह से स्थित है। इस प्रकार मैंने आपको चार संस्थाओं के बारे में बताया है। जो मध्यवर्गी संस्था है, इसको हम श्री विष्णु की संस्था कहते हैं। श्री विष्णु की शक्ति से पहले तो धर्म की धारणा होती है। धर्म की धारणा से ही उत्थान बनते जाता है। जैसे कि एक आप केमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) का पीरियाडिक टेबल देखें, तो आप समझ सकते हैं कि किस ख़ूबी से सारे जितने भी एलिमेंट्स हैं उनको परमात्मा ने किस ख़ूबी से उनको व्यवस्थित रूप से रचा है। और उसकी अलग अलग शक्ति कहिये या धर्म धारणा उन लोगों की भी है। उनके आठ वैलेन्सीस होतीं हैं और यह सब कुछ आप किसी भी मेडिकल या किसी भी केमिस्ट्री वाले से पूछ सकते हैं। और यह आठ वैलेंसीइस में से, किसी के पास में चार होती हैं पूरी या आठ पूरी होतीं हैं जो संपूर्ण होते हैं, और किसी के पास एक या दो हो जातीं हैं की कमी या ज़्यादती होने के कारण ही उनका जो कुछ भी व्यवहार है वो होते रहता है। यह बहुत ही ख़ूबी से बनाई हुई चीज़ है। यह भी धारणा, यह भी धर्म धारणा, यह भी विष्णु तत्व से ही होता है। जैसे कि सोने की धर्म धारणा है कि वो कभी भी ख़राब नहीं होता है, काला नहीं होता है, अनटार्निशिबिल है। यह भी धर्म धारणा विष्णु तत्व से होती है। यह विष्णु तत्व हमारे अंदर नाभि पर जागृत है। जब यह तत्व ख़राब हो जाता है, तब हमारी उत्क्रांति रुक जाती है। यही तत्व हमें अधिकतर सहज योग में व्यव्हार में लाना है और इसी के बारे में हमें ज़्यादा विचारणा करनी होगी। मैंने आपसे पहले बताया है, कि कुण्डलिनी जो है, यह महाकाली की शक्ति का अवशेष या रेसिडुअल पार्ट है। इसमें जो कुछ हमने आजतक किया हुआ है, जो गलतियाँ की हों, जो पुण्य सम्पदा की हो, जिस तरह से भी हमने जो कुछ पाया हुआ है, जो भी थे हमारे संस्कार, चाहे कुसंस्कार हों, चाहे सुसंस्कार हों, हर कुछ, हमारी बीमारियाँ, हमारी तक़लीफ़ें इस जन्म और अनेक जन्मों की, सारी की सारी इसमें सब टेपड हैं। और यही आपकी माँ है जो यह सारे सुसंस्कार अपने अंदर समाये हुए है आपके साथ विचरण करती है। इसीलिए हम इसे सहज योग कहते हैं। लेकिन यह आपके त्रिकोणाकार अस्थि में साढ़े तीन कुण्डलों में स्थित होती है। यह साढ़े तीन क्यों होती है वगैरह का भी बड़ा भारी गणित है पर उत्तर भी मैं बोलने लगूँ तो एक (अस्पष्ट) बीत जाएगी। ये कुण्डलिनी हमारे अंदर है या नहीं, ये आप अपनी आँखों से देख सकते हैं। जब कुण्डलिनी का जागरण होता है, तब आप देख सकते हैं कि आपकी ये त्रिकोणाकार अस्थि में किस प्रकार स्पंदित करती है। जब भी नाभि चक्र में पकड़ हो जाती है, तब विशेषकर इसका स्पंदन इतनी ज़ोर से दिखाई देता है कि एक छोटा बच्चा भी इसको देख ले। इसके लिए कोई भी प्रमाण की ज़रुरत नहीं।

इसकी हम लोगों ने फिल्म भी बनाई हुई है जो हम बीबीसी से सब दिखाने वाले हैं। कुण्डलिनी यहीं पर स्थित होती है और किसी जगह नहीं। अब आप पढ़िए कोई कोई किताबें हैं - एक आनंद साहब ने एक इतनी बड़ी किताब कुण्डलिनी की लिखी है। उनको अभी तक यह भी पता नहीं एक्साक्ट्ली (सही तरह से) कहाँ कुण्डलिनी हैं। फिर लिखते क्यों हो? इतनी बड़ी किताब लिखने का उनको किसने अधिकार दिया? क्योंकि वो अँगरेज़ हो गए इसका मतलब ये थोड़ी है कि आप जो चाहें सो लिखें? किताबें पढ़ पढ़ के और अनुभव के बगैर, देखे बगैर ही उन्होंने लिख दिया कि कुण्डलिनी शायद पेट में होती है और या तो (अस्पष्ट) में शायद उससे कुछ नीचे होती है और या तो सीट पर होती है। परमात्मा की जितनी भी चीज़ बनाई हुई है उसमें इतना सा भी इधर उधर नहीं होता है - सत्य एक ही होता है। यह सब कन्फयूजन तो मनुष्य के दिमाग में अराइज होते हैं। ये यहाँ है, कि वहां है, कि ये है। परमेश्वर ने जहाँ जो चीज़ बनाई वह वहीँ होगी और कहीं नहीं होगी, यह आप अपनी आँख से देख सकते हैं।

यह त्रिकोणाकार अस्थि में बैठी हुई कुण्डलिनी अनेक जन्मों से आपके साथ है विचरण करती है। मृत्यु के बाद भी आप ही के सर पर मंडराती रहती है और जैसे ही आप जन्म लेते हैं, फिर से आप ही के अंदर प्रवेश करके वहीँ स्थित हो जाती है। मृत्यु होना और फिर से जन्म लेना ये भी एक बड़ा भारी चयन का कार्य है। उसके बारे में बताने के लिए एक बड़ा भारी लेक्चर देना होगा। लेकिन हमारा मृत्यु से कोई सम्बन्ध इस वक़्त नहीं है - आज वर्तमान, प्रेसेंट से हमारा सम्बन्ध है और उसी के बारे में हम बात करेंगे। जैसे कि लेफ्ट साइड की इड़ा नाड़ी हमारे सबकॉन्ससियस से मतलब रखती है, हमारे पास्ट से मतलब रखती है, उसी प्रकार राइट साइड की जो नाड़ी है, जिसे पिंगला नाड़ी कहते हैं, वो हमारे फ्यूचर से सम्बन्ध रखती है, भविष्य से सम्बन्ध रखती है। और जो बीचो-बीच हमारी जो नाड़ी है वो, आज से, वर्तमान से, इस क्षण से। इसके बीच में जो गैप है, जो आप देख रहे हैं, इसी के कारण मनुष्य वर्तमान में नहीं रह सकता। या तो वह आगे रहता है या पीछे रहता है - बीचो-बीच वर्तमान में नहीं रह सकता, प्रेसेंट में नहीं। अब कुण्डलिनी जागरण कैसा होता है वह देखिये। जिस वक़्त आप मेरी ओर हाथ ऐसे करके बैठे हैं तब मेरे अंदर से जब ये शक्ति - वैसे भी बह रही है - वो आपके हाथ से गुज़र के, क्योंकि उँगलियों में भी, आप देखिये वहाँ उँगलियों में इन्होंने दिखाया नहीं है, लेकिन पिछले चार्ट पे हमने दिखाया था कि इनमें भी चक्र हैं।

राइट और लेफ्ट में, राइट हैंड में और लेफ्ट हैंड में भी चक्र हैं और यह सारी उँगलियाँ, उँगलियों के जो किनारे हैं, जिसको कहना चाहिए कि जो एड्जेस जिसे कहते हैं, इस जगह पर उन चक्रों का स्थान है। और यह चक्र जब जागृत हो जाते हैं, तब आप इनपे महसूस कर सकते हैं कि, आपके कौन से चक्र पकडे हैं और दूसरों के कौन से पकडे हैं। इससे लेफ्ट सिम्पैथेटिक, और इससे राइट सिम्पैथेटिक, दोनों साइड के चक्र आप इसपे जानते हैं और जब आप चक्रों को पकड़ लेते हैं तो आप कोई सी भी बीमारी चक्रों की वजह से ठीक कर लेते हैं।

जैसे कि एक कल लड़की आ रही थी मिर्गी की बिलकुल अचानक ठीक हो गयी, बहुत अच्छे से चलने-वलने लग गयी, उनको मल्टीप्ल स्क्लीरोसिस था जो कि इनक्योरइबल है कोई नहीं ठीक कर सकता, वह सहजयोग से ठीक क्यों हो गई ? वजह ये है कि इसमें तो पहले निदान होता है कि कौन से चक्र पकडे हैं। मूलाधार चक्र पकड़ा हुआ है, ह्रदय चक्र पकड़ा हुआ है। अगर आप मूलाधार चक्र पर श्री गणेश को जागृत कर दें और ह्रदय चक्र में शिव को संतुष्ट कर दें, तो फ़ौरन (अस्पष्ट - वहाँ वायब्रेशन्स आ जायेंगे?) क्योंकि उसके जो चक्र हैं, जो अंतर में हैं, जो उसके बेसिक हैं, उसको यहाँ पे अगर ठीक कर दिया, तो आदमी ठीक हो जायेगा।

डायग्नोसिस भी इंसान ही करता है उसमें। जो बाहर आदमी हो जाता है, वह खुदी डायग्नोसिस करता है। वही ट्रीटमेंट देता है और वही दवा भी देता है और वही दूसरे को पार भी करता है। जो सबसे पहला चक्र है, वह कुण्डलिनी के नीचे है। इसे बहुत समझ के परमात्मा ने वहाँ रखा हुआ है। यह चक्र जो है, यह चक्र श्री गणेश के कारण शोभित है। इस चक्र का नाम मूलाधार चक्र और उससे ऊपर मूलाधार है।

त्रिकोणाकार अस्थि को हम मूलाधार कहते हैं, कोई लोग उसको कुम्भ-कुंड कहते हैं - दुनिया भर के नाम दिए हुए हैं। पर मूलाधार चक्र में श्री गणेश जी रहते/बैठे हैं और ये जो मूलाधार चक्र है, इसको समझ लेना बहुत बहुत ज़रूरी है कि इसी से हमारा सेक्स भी संचालित रहता है और ऊपर श्री गणेश को बिठा दिया। श्री गणेश एक अबोध बालक हैं इसलिए उनको वहाँ बिठाया गया क्योंकि वह इतने पवित्रतम हैं, कि उन्हें कोई भी गँदगी नहीं छू सकती इसलिए उनको बिठाया है। क्योंकि छोटे बालक में इतनी अबोधिता होती है, कहना चाहिए, इनोसेंस होता है, कि वह इन सब चीज़ों से परे होता है। इसलिए श्री गणेश को वहाँ बिठाया है। श्री गणेश वहाँ बैठकर जो कुण्डलिनी गौरी स्वरूपा हैं - माने वह विवाहिता तो हैं पर अभी पति से मुलाकात नहीं हुई - अभी वर्जिन हैं - वर्जिनिटी में ही उन्होंने अपने गणेश को बनाकर बिठाया हुआ है - देखिये कितनी सुन्दर उसकी व्यवस्था है और वह वहाँ बैठीं हुईं हैं, पति के इंतज़ार में, शिव से मिलने के इंतज़ार में, उसकी लज्जा रक्षा के लिए, उसके प्रोटोकॉल के लिए, श्री गणेश वहाँ बिठाये हैं।

अब इसपर मैं आपको यह बताऊँगी कि तांत्रिकों ने क्या गलती कर दी। इस वजह से, कि मैं माँ हूँ, मैं यह नहीं कहूँगी कि जान-बूझ करके उन्होंने यह काम किया क्योंकि यह महापाप हो जायेगा। लेकिन ग़लती से ही हो सकता है कि, शुरुआत में जब उन्होंने मनन शुरू किया, तो इतनी शुद्धता न होने के कारण, हो सकता है, कि श्री गणेश की सूंड को ही उन्होंने कुण्डलिनी समझा होगा और इस वजह कुण्डलिनी का स्थान इस जगह माना होगा जहाँ हम लोग चक्र की धारणा करते हैं; जहाँ श्री गणेश हैं वहाँ कुण्डलिनी नहीं है और इसीलिए उन्होंने ऐसी थ्योरी निकाली हो कि सेक्स करने से कुण्डलिनी ऊपर चढ़ती है; शुरुआत में शायद ऐसी ग़लती हो गयी हो। हो सकता है, क्योंकि माँ के रिश्ते में मैं पूरी तरह से उनको दोष नहीं दूँगी। वो भी मेरे बच्चे ही हैं। लेकिन इससे बढ़के कभी भी कोई भी गलती इंसान ने नहीं की। आप सोचिए कि कुण्डलिनी आपकी माँ है और उस पर कितना बड़ा दोषारोपण हो रहा है। लेकिन इस गलती को लेकर सारा तांत्रिक समाज तैयार हो गया। छठी शताब्दी में, अपने देश में तो हाहाकार मचा दिया तांत्रिकों ने और सारे राजे महाराजे, जो कि गंदगी के बिल्कुल मैले-कुचैले जीवन से प्लावित थे, उन्होंने इसको और भी ज़्यादा शह दे देकर इतनी बुरी हालत कर दी, कि हमारे सारे शिल्प कलाओं ने, यहाँ तक कि हमारे शास्त्रों ने (अस्पष्ट) इन्होंने यहाँ तक कहना शुरू कर दिया कि शिव और शक्ति यह भी सब (अस्पष्ट) हुई थी और ऐसा कहना शुरू कर दिया कि अश्वमेध यज्ञ भी एक (अस्पष्ट) ही थी।

जिस आदमी की आँख सावन में अंधी हो जाती है, उसको सब ही हरा दिखाई देता है। इतने ऊँचे पवित्रतम तत्व को उन्होंने लाकर के बिल्कुल मिट्टी में डाल दिया। तांत्रिक तो असल में हम हैं क्योंकि हम तंत्र को जानते हैं और हम तंत्र चलाते हैं। यही आपका तंत्र है जिसे कुण्डलिनी कहते हैं। लेकिन इन दुष्टों ने अपना नाम तांत्रिक रख लिया; यह तो ऐसा हुआ कि कोई चोर आकर के कहे कि मैं राजा हूँ। और इसी दुविधा के कारण मनुष्य को यही नहीं समझ में आता है कि कुण्डलिनी का नाम लेते ही, माताजी पवित्रता की बात कैसे करती हैं। यह कुण्डलिनी जो कि पवित्रतम चीज़ है, उसका संबंध पवित्रता से लगाने पर ही लोग चौंक जाते हैं। कितना अँधकार है! फिर जब इस तरह के लोग जिनके जीवन में चरित्र का कोई मतलब नहीं, जिनमें पावित्र्य नहीं, जो बुरी तरह से अपनी ज़िन्दगी बिता रहे हैं, जिन्होंने अपने सर्वनाश की पूर्ण व्यवस्था कर ली है, ऐसे लोग कुण्डलिनी पर हाथ डालेंगे, तो ज़रूरी है कि उनके अंदर गर्मी आएगी, उनका शॉर्ट सर्किट होगा, आफतें आएँगी, वो कूदेंगे और दुनिया भर की चीज़ें। ये अनुभव जिन जिन लोगों को आये हैं वह लाज़मी है क्योंकि इस गलती के लिए श्री गणेश के कारण सारा सिम्पैथेटिक वह तोड़ देते हैं। हमने ऐसे ऐसे लोग देखे हैं कि जिनकी कुण्डलिनी जब लोगों ने चढ़ाई, तो यहाँ से लेकर यहाँ तक पूरे ब्लिस्टर्स आए। कुण्डलिनी चढ़ी नहीं, वह तो सिम्पैथेटिक का रिएक्शन आ गया था जो कि दोनों साइड में वहाँ से गुज़र रही है, आप देख लीजिए।

गणेशजी से आप कुण्डलिनी चढ़ाने से रहे। वो तो पिछवाड़े बैठे हुए हैं, लेकिन जब परदेस से लोग अपने देश में आते हैं, तो वह अपने बाथरूम से ही या अपने बहते हुए नाली से अंदर से घुस के आते हैं सब लोग और फिर वहीं का वर्णन अपने देश के बारे में देने लग जाते हैं - गधे हैं बिल्कुल। आना है तो महाद्वार से आयें और समझें कि हमारे देश की सभ्यता क्या है।

जो भी आता है, ह्यूम जैसा इतना पढ़ा लिखा आदमी, जिसको मैं बहुत मानती हूँ, वह भी गधा ही था क्योंकि वह भी उसी रास्ते से आया और उसने सारा तांत्रिक इसका महत्व फैलाया। इनको इसलिए बताने के लिए हमारे पास कोई भारतीय नहीं रहेगा क्योंकि भारतीय पढ़ते ही नहीं और न ही इस चीज़ को समझने की कोशिश करते हैं कि कुण्डलिनी का शास्त्र असल में क्या है।

जिस वक्त कुण्डलिनी आपकी जागृत होती है, आपको आश्चर्य होगा, उस वक्त आप अबोध बालक जैसे हो जाते हैं क्योंकि गणेश पहले ही जागृत हो जाते हैं। पहले तो गणेश को ही - हाथ से जो वायब्रेशन्स जा रहे हैं, आपके हाथ मेरे ओर हैं - जो वायब्रेशन्स आपके हाथ से गुज़र के जाते हैं, वह पहले गणेश को ही खबर करते हैं कि, "हाँ, अब माँ आ गयी है सामने," और आप एक छोटे बालक जैसे हो जाते हैं क्योंकि वह बीच का रास्ता ही तोड़ देते हैं। उसके बाद ही कुण्डलिनी उठती है - जब तक गणेश सैंक्शन नहीं करेंगे कभी कुण्डलिनी नहीं उठेगी। अगर आप बिल्कुल ही अपवित्र आदमी होंगे, तो कुण्डलिनी उठ नहीं सकती या किसी ने आपके मूलाधार पे आघात किया होगा तो भी नहीं उठेगी।

अधिकतर आज कल के गुरु यही धंधा कर रहे हैं। आपकी कुण्डलिनी को ये लोग तोड़ते हैं। मुझसे लोग बहुत नाराज़ होते हैं जब मैं गुरुओं को बुरा भला कहती हूँ। "माताजी मत कहो।" क्या मैं उनके गले में हार पहनाऊँ और उनकी आरती उतारूँ, जो आपकी कुण्डलिनी को तोड़ते हैं, जो आपके पुनर्जन्म होने का सारा ही संसार ही तबाह कर देते हैं और आपको उससे वंचित कर देते हैं जो आपका अपना अधिकार है? इन लोगों को आपके पैसे से मतलब है, वो आपके पैसे खायें, उससे मुझे हर्ज़ नहीं है। चोरी करें, उसमें भी मुझे हर्ज़ नहीं है, जो करना है करें, डाकू बनें, आपकी औरतों को खराब करें - अगर आपकी औरतें इतनी बेवकूफ हैं तो खराब हो जाएँ, मुझे उससे मतलब नहीं है लेकिन कुण्डलिनी पर जब वो हाथ मारते हैं और कुण्डलिनी को ही खराब करते हैं, तो इनको राक्षस की ही संज्ञा देनी चाहिए। और हैं ये राक्षस। ऐसे सोलह राक्षस कमसकम मुझे मालूम हैं जो बड़े बड़े राक्षस हैं। इनको बहुत बार देवियों ने मारा और बार बार वह जन्म लेते हैं और उन्होंने फिर से जन्म इसी कलयुग में लिया है। और छह राक्षसनियाँ हैं उन्होंने भी जन्म लिया हुआ है और लोग उनको पूजते हैं। इत्ते (इतने) बेवकूफ लोग हैं, उसकी कोई हद्द नहीं।

ये जो कुण्डलिनी हैं, यह आपकी माँ हैं, ये वहाँ बैठी हुईं हैं, इंतज़ार में, कि वह दिन आये कि मेरा बेटा उसका पुनर्जन्म हो। यही आपको पुनर्जन्म देगीं। इसी से आप द्विज जाने वाले हो। तब अगर आप सुपरफीशियल आदमी हैं, आपमें कोई गहराई नहीं, आप चाहते नहीं थे, कुण्डलिनी खुद ही उठती नहीं है। आपने अगर गलतियाँ करीं हैं, तो भी वह बताती है कि इन्होंने यह गलती की है। आपके चक्रों पे पता हो जाता है कि यह आपने गलती की, वो आपने नहीं की और इसी तरह से कुण्डलिनी का पूरा पता चल जाता है।

लेकिन अगर आप अपनी कुण्डलिनी को ठीक से संभाल के रखे हैं, जैसे कबीर ने कहा कि, "दास कबीर जतन से ओढ़ी, जैसी थी तैसी रख दीनी चदरिया," उसी वक़्त, ऐसे सब लोगों की कुण्डलिनी बहुत आसानी से जागृत हो जाती है।

अब इसके बाद जो ऊपर का चक्र है, जिसे स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं, यह हमारे नाभी से निकलता है और चारों तरफ घूमता है। इसे स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं और यह नाभी से निकल के चारों तरफ घूमता है। स्वाधिष्ठान चक्र से हमारा चित्त कार्यान्वित होता है, अटेंशन। जहाँ हम अटेंशन डालते हैं वहाँ स्वाधिष्ठान कार्य करता है। इसीलिए जब हम बहुत ज़्यादा विचार करने लगते हैं, तब भी स्वाधिष्ठान चक्र पेट का जो मेद होता है, जो फैट होता है, उसको परिवर्तित कर देता है, उसको ट्रांसफॉर्म कर देता है कि वो जाके हमारे बुद्धि में उपयोग में लाये। बुद्धि में भी तो मेद होता है, फैट ग्लोब्युल्स होते हैं। ये जो फैट ग्लोब्युल्स हैं, जिसको हम इस्तेमाल करते रहते हैं, उसके लिए अपने पेट से ही स्वाधिष्ठान चक्र बना कर के फैट ग्लोब्युल्स ब्रेन में देता है। यही चक्र है जिसके कारण, हमारा लिवर - ऊपर का हिस्सा, हमारा स्प्लीन, और हमारा पैंक्रियास, किडनी और यूटरस का कुछ हिस्सा चलता है। ये क्रिएशन का चक्र है। जब हम जितना सोचते हैं आगे के लिए, हम क्रिएट करना चाहते हैं, जितना हम फ्यूचर के बारे में सोचते हैं और प्लैनिंग करते हैं, उतना ही यह चक्र चलता है। अब ये हमारे अटेंशन को प्लावित करता है, हमारे चित्त को प्लावित करता है। जिस आदमी का लिवर खराब है, उसका चित्त हमेशा दुखी रहेगा, एक अनमना सा रहेगा। उसको कुछ चीज़ अच्छी नहीं लगेगी। उसका दोष नहीं, क्योंकि उसका लिवर ठीक नहीं है। इसीलिए उसको लिवर कहते हैं - कि आप लाइफ जीवन से सम्बंधित है। उसी प्रकार, जो आदमी बहुत ज़्यादा सोचता है, और बहुत ज़्यादा प्लैनिंग करता है, उसका भी स्वाधिष्ठान चक्र खराब हो जाता है, क्योंकि, या तो वह सोचने का काम करे और वहाँ पर अपना वो ब्रेन जो है, ब्रेन के लिए सप्लाई करता रहे बेचारा और या तो इन सब ऑर्गन्स को देखे। उसमें से जो पैंक्रियास हैं, ये जब खराब हो जाता है, तो आपको डायबिटीज की बीमारी हो जाती है। डायबिटीज की बीमारी सहज योग में सौ फ़ीसदी ठीक होती है, सौ फ़ीसदी।

इस तरह की अति विचारणा से मनुष्य की राइट साइड बहुत ज़्यादा काम करती है और जो लेफ्ट साइड है वो एकदम निराश्रित हो जाती है या कहें निराश हो जाती है, निग्लेक्टेड हो जाती है।

इसी के कारण, जब मनुष्य बहुत ज़्यादा सोचता है, बहुत मेहनत करता है, फ़िज़िकल एफर्ट, जिसको कहना चाहिए, शारीरिक, तो उसको हार्ट अटैक आ जाता है। जब उसको हार्ट अटैक आ जाता है, तो उसको समझ लेना चाहिए कि अब मैंने अति कर दी, इम्बैलेंस, असंतुलन उसके अंदर आ गया। उसको अब फ़ौरन समझ लेना चाहिए कि अब उसको थोड़ा सा अपने इमोशंस की तरफ भी ध्यान देना चाहिए और बैलेंस में आना चाहिए। सहज योग में पार होने के बाद बैलेंस लाने की बहुत ही सादी क्रिया है कि आप लेफ्ट साइड तो उठा के राइट साइड में कर दीजिये। अभी भी बहुत से लोग विचारक यहाँ पे आये थे जिनको पार नहीं हो रहे थे, उनकी लेफ्ट साइड उठा के राइट साइड को कर दी, तीन बार भी कर दी, तो भी कुण्डलिनी बाहर निकल गयी।

क्योंकि जैसे आपने ऊपर देखा है, कि जब आप बहुत विचार करते हैं या बहुत कुछ कार्य में संलग्न होते हैं, तो आपका ईगो अहंकार डेवलॅप होता है, जो कि ऊपर दिखाया गया है, जो असल में सर में से, इस तरह से घूमता हुआ यहाँ तक एक बलून के जैसे पलता जा रहा है। और जब आप अपने अंदर कंडीशनिंग करते हैं, मतलब उस ईगो को दबाने की कोशिश करते हैं, तो आपके अंदर प्रतिअहंकार जागृत होता है, जिसे सुपरईगो कहते हैं, वो आपके पीछे से ले करके राइट साइड में यहाँ तक आता है - वो भी असंतुलन है। इस तरह के दो बलून आपके अंदर तैयार हो जाते हैं। जब एक बलून दूसरे से ज़्यादा डेवलॅप हो जाता है, तो वो दूसरे पे काबू पा लेता है और उसको दबा देता है। आजकल हिंदुस्तानी लोगों का ईगो ज़्यादा बढ़ा हुआ है क्योंकि हम लोग डेवलॅप कर रहे हैं, तो बहुत प्लैनिंग कर रहे हैं, बहुत कार्यरत हैं - बहुत सोचने से हमारा ईगो बढ़ा हुआ है।

आजकल पाश्चिमात्य लोगों का सुपर ईगो बढ़ गया क्योंकि उनका इतना ईगो बढ़ गया था पहले, इतना ईगो बढ़ गया, कि सुपर ईगो को एकदम दबोच मारा। तो परेशान हो गए लोग बिलकुल। तो उन्होंने सोचा इसकी कोई न कोई पकड़ लेनी चाहिए। तो उन्होंने अवलम्बन किया ड्रग्स वगैरह का। ड्रग्स वगैरह के अवलोकन से सुपर ईगो बढ़ गया। सुपर ईगो ने इतना धक्का दिया कि ईगो इधर आ गया और सुपर ईगो बढ़ गया। अब इन दोनों के बीच में वोब्ब्लिंग हो रहा है। इधर से उधर धक्का मार रहे हैं और कहीं वो ठिकाने से नहीं हैं। पूरी समय उनके अंदर वोब्ब्लिंग में दिमाग है। अजीब परेशान लोग हैं। आप जानते हैं कि लोग सबसे ज़्यादा जो सुबत्ता वाले देश हैं, स्वीडन जैसे देश में सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ हो रहीं हैं क्योंकि ये दिमाग में ईगो, सुपर ईगो का झगड़ा चालू है। उनके बस का नहीं जीना।

एक मिनट में आप अगर देखें, तो सब मिल बैठे हैं वहाँ अमेरिकन, तो उनकी किसी की नाक सुकड़ रही है, किसी का सर चल रहा है, किसी की आँख फड़क रही है, किसी का मुँह ऐसा-ऐसा हो रहा है - एक मिनट भी वो शान्ति से नहीं बैठ सकते। सारे आँख यहाँ पर बल पड़े होंगे बड़े-बड़े। जवान लोगों के आप देखिएगा तो बड़े बड़े बल पड़े होएँगे - यहाँ पर चिंता। इसकी वजह ये है के उनके अंदर ईगो और सुपरईगो का झगड़ा खूब चल पड़ा है और इतना ज़्यादा। भ्रम और कन्फ्यूजन उनके माइंड में है, कि वो समझ ही नहीं पाते कि क्या चीज़ है। और इसी का फ़ायदा उठा कर के, जितनी भी आसुरी शक्तियाँ हैं या नेगटिविटीज़ हैं, वो सारी उनकी खोपड़ी में घुस जातीं हैं। और इसीलिए वो ऐसी-ऐसी चीज़ों का अवलम्बन करते हैं, जिससे वो पलायन कर सकें और इस संसार के जो कुछ भी प्रश्न हैं उससे दूर भागें।

ये स्वाधिष्ठान चक्र बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि जो लोग अति कार्य करते हैं, जब वह अतिशयता पे पहुँच जाते हैं तो - इसे हम सुपरा कॉन्ससियस एरिया कहते हैं क्योंकि राइट हैंड साइड पर है - वो जब अति क्रमण कर जाते हैं, तो वो कलेक्टिव सुपरा कॉन्ससियस में चले जाते हैं। इस प्रकार जब वह लेफ्ट साइड पे अतिक्रमण करते हैं, तो वह सब कॉन्ससियस से कलेक्टिव सब कॉन्ससियस में चले जाते हैं।

मनुष्य के ऊपर का जो हिस्सा है वह कलेक्टिव कॉन्ससियस है। अब जो लोग बहुत ज़्यादा पढ़े हुए आदमियों पे विचार करना, मृत्यु पर विचार करना, विशेषकर बुद्ध धर्मी लोगों में बहुत ज़्यादा यह चीज़ आ गई; आज तक की बात कि बुद्ध धर्मियों ने पता नहीं क्यों मृत्यु को इतना ज़्यादा माना हालाँकि, मेरे विचार से, बुद्ध ने कभी नहीं माना होगा। और बुद्ध ने तो यहाँ तक कहा था किसी भी चीज़ की, मरी हुई चीज़ की आप पूजा न करें। उसके उलटे बिलकुल ही, बुद्धिस्ट जो लोग हैं, बहुत से बुद्धिस्ट, लद्दाख में जाइये तो, तिब्बत में जाइये तो, सारे ही प्रेत विद्या है। प्रेत विद्या, शमशान विद्या, भूत विद्या - महावीर के भी लोगों का यही है। लेकिन महावीर से भी ज़्यादा इन लोगों ने अतिशय कर दिया। कमस कम महावीर के लोग उसके उलटे चलने की वजह से, या चाहे जैसा भी हो, वो मंदिर बनायेंगे, पहले गुफाएं बनायेंगे, कहीं चित्रकारी करेंगे, कहीं कुछ नहीं मिला तो कपड़ों की दुकाने बनायेंगे, कपडे बेचेंगे, इस तरह के कार्य करते हैं। और बुद्ध के लोग, जिसने कि कभी भी मृत्यु की कभी बात नहीं की थी - महावीर ने ज़रूर मृत्यु और नर्क की बात की थी - लेकिन बुद्ध ने कभी मृत्यु की बात नहीं की - सब के सब मृत्यु पे लगे हुए हैं। लद्दाख में तो साइन बनाया हुआ है कि किस आदमी को किस तरह बिठाना चाहिए, उसको कैसे गाड़ना चाहिए, उसका हाथ कैसे काटना चाहिए, उसको कहाँ उसका हाथ रखना चाहिए, उसकी कैसी व्यवस्था करनी चाहिए - कौन से बुद्ध की किताब में लिखा, मैं तो जानती नहीं हूँ लेकिन वो कभी भी ऐसी बात लिख नहीं सकते, यह मैं अभी बात बता रही हूँ। सारी प्रेत विद्या, भूत विद्या, पिशाच विद्या, सारी हमारे (बिलकुल) लेफ्ट साइड में घुसे चली जाती है और इसके साथ आपके पास में सूत्र हैं जिनके आपने नाम भी सुने होंगे के, जिसे हम कहते हैं हाकिनी, डाकिनी, शाकिनी, वगैरह, वगैरह। इस तरह के सात तार हैं, जिसके झंकार होते हुए, रेजोनेंस के साथ में आदमी ढकेलता हुआ चला जाता है कलेक्टिव सब कॉन्ससियस में। और कलेक्टिव सबकॉन्ससियस में, सामूहिक सुप्त चेतन में, जितने भी मरे हुए लोग हैं सारे, ये मरे हुए लोग वो होते हैं, जो ज़िन्दगी से घबड़ाये हुए, भागे हुए, पलायत, जो बहुत ही दुष्ट प्रवृत्ति के भी होते हैं, महादुष्ट प्रवृत्ति के भी हो सकते हैं लेकिन उनमें हिम्मत नहीं कि खुले आम यह काम करें, वह बहुत सीक्रेटली यह गंदे काम करते हैं। यह लोग जो इस प्रकार के अतृप्त होते हैं, वह भी वहीँ पर विचरण करते हैं। उससे परे ही हमारा स्थान होता है जब हम मर जाते हैं, तो हम कलेक्टिव सबकॉन्ससियस में रहते हैं लेकिन हम उस दिन का इंतज़ार करते रहते हैं जिस दिन हमारा पुनर्जन्म होगा। हम उस चीज़ को नहीं मानते हैं कि आप अतृप्त भावना से यहाँ भटकते हैं। ये भटकते हुए जीव जो होते हैं, लेफ्ट साइड में, वो बहुत ही ख़राब होते हैं, और जब वो अपने शरीर में या अपने आज्ञा चक्र से जब प्रवेश करते हैं, तो मनुष्य को जो मिर्गी जैसी बीमारियाँ, या सर फिर जाना, या जिसे कहते हैं कि पागल हो जाना, दुनिया भर की इस तरह की बीमारियाँ हो जातीं हैं। यह सारी इड़ा नाड़ी की बीमारियाँ हैं और जो साइकोलॉजिस्ट जिसे ट्रीटमेंट देते हैं वो सारी बीमारियाँ हमें लेफ्ट सबकॉन्ससियस से होतीं हैं।

अब हमारे जो फ्रायड साहब थे वो भी एक ही अक्लमंद थे। उनको तो मेरे ख्याल से उनको एक आँख से दिखता था, दूसरी आँख ठीक नहीं थी। वो सिर्फ यही साइड देखते थे, उन्होंने दूसरी साइड देखी ही नहीं। वो कहते थे कि सारा कंडीशनिंग है बाकी कुछ नहीं। और उसकी शुरुआत क्योंकि सेक्स से होती है, उन्होंने सारी चीज़ लाकर के उसके सामने रख दी। काश वह थोड़ा सा भारतीय काम शास्त्र पढ़ते तो उनकी अक्ल थोड़ी सी ठीक होती। लेकिन इतनी एकांगी उनकी दृष्टि थी, वह एक ही साइड में देखते थे और स्वयं जीवन में वह अत्यंत घृणित आदमी थे। उनका अपने माँ से ही गन्दा सम्बन्ध था इसलिए उन्होंने सारी चीज़ ला कर के रख दी है। और होता भी है। अगर साइकोलॉजिस्ट हर समय पागल आदमियों के साथ रहेगा, तो ख़ुद ही पागल हो जायेगा। उसके अंदर वह सारी गंदगियाँ आ जातीं हैं जो वह पागल आदमियों से देखता है। यह शायद साइकोलॉजिस्ट जानते नहीं। अब हमारे यहाँ आये हुए है एक, जो वहाँ के बड़े अच्छे साइकोलॉजिस्ट हैं, वो ख़ुद बताते हैं। क्योंकि अगर किसी आदमी को टी.बी. हो जाए, तो हम समझते हैं कि उसे टी.बी. हो गया हमें बचाव करना चाहिए लेकिन इन भूत प्रेत से बचाव करने का हम कोई तरीका नहीं जानते हैं।

हम लोग जब उनसे डील करते हैं, उनसे जब बातचीत करते हैं, तो हो सकता है कि वो भी हमें कुछ दे दें। और इसी कारण बहुत से लोगों की बीमारियाँ लोग ठीक नहीं कर सकते क्योंकि वो इसे देख नहीं पाते, यह सूक्ष्म चीज़ें हैं, यह अपने अंदर वास करती हैं, लेकिन ये ज़रूर होतीं हैं, और यह स्थित होती हैं। अब राइट साइड में जो आप जाइये तो इससे राइट में आपको सुपरा कॉन्ससियस एरिया में... आप अगर पहुँचें, तो वहाँ से आप अगर अतिक्रमण कर दें, तो आप कलेक्टिव सुप्रा कॉन्शियस में चले जाते हैं। इस जगह ऐसे लोग रहते हैं, जो बहुत महत्वाकांक्षी होते हैं, एम्बिशयस लोग होते हैं, जो हमेशा फ्यूचर की बात करते हैं। जो लोग फ्यूचर की बात; आत्मा जब किसी की तृप्त हो जाए, तो वह तो फ्यूचर की जगह पहुँच जाते हैं।

लेकिन जैसे हिटलर मारा होगा तो वह यहीं बैठा होगा क्योंकि अभी अतृप्त है, तो वह वहाँ नहीं होगा। बहुत ज़्यादा जो महत्वाकांक्षी लोग होते हैं, उनके लिए यह जगह बनी हुई है। जब आप सुप्रा कॉन्शियस में चले जाते हैं तो आपके अंदर इसी में से प्रेत आते हैं। जब ये स्पिरिट्स आपके अंदर आ जाएँगे, तो वह आपके अंदर चालना भी करेंगे। आप वही चीज़ करेंगे पागल जैसे काम करेंगे (अस्पष्ट)। पागल जैसे वह दौड़ता रहेगा। अभी आप देखिएगा उसको हार्ट अटैक आएगा या फिर पागल हो जाएगा, फिर लिप्त हो जाएगा।

बहुत से बच्चे आपने देखा होगा पढ़ते होएँगे उसके बाद में फर्स्ट क्लास फर्स्ट और देखा हटात, फर्स्ट क्लास फर्स्ट आने के बाद एकदम (अस्पष्ट)। यह बड़ी कॉमन सी बात है। ये इसी वजह से है।किसी भी चीज़ की इतनी महत्वाकांक्षा करने की, यह अतिशय पे चलने के लिए .....। अगर वो बहुत ज़्यादा (अस्पष्ट) ये नहीं होना चाहिए (अस्पष्ट)।

हठ योग या ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन यह भी यही है। इसमें सिर्फ आपके अंदर इस तरह का महत्वाकांक्षी भूत भर दिया जाता है।राम नाम का एक ऐसा भूत आपके अंदर भर दिया। आप लगे काम में। खूब आपने मेहनत करना शुरू कर दी।दस साल के अंदर आपकी यह हालत होती है जैसे कि टूटी हुई मोटर खड़ खड़ खड़ खड़ कर चले।

अभी मैं मिलान में गयी थी सबसे पहले वहीँ पर ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन ... वहाँ जितनों ने किया। आज आप जा कर के देख लीजिये आप कान पकड़िएगा कभी इन्वॉल्व (अस्पष्ट - नहीं होएँगे?)। क्योंकि जब आप ट्रांस में जाते हैं तो आप इसी सुप्रा कॉन्शियस एरिया में (जाते हैं)। और ये सुप्रा कॉन्शियस के भूत सबके और आप पे ये भूत सवार हो जाते हैं।ट्रांस का भूत आपके पे सवार हो जाता है। आपका जो अपना है वो तो सब खो जाता है। आप दूसरे का ही बोझा अपने सर पे ले कर घूमते हैं। समझ लीजिये आपके ऊपर हिटलर आ के बैठ गया। आपकी क्या दशा हो जाएगी? हो सकता है आप बड़े सक्सेसफुल आदमी हो जाएँ, बड़े यशस्वी दुनिया को नज़र आयें, लेकिन दस साल बाद आपकी जो हालत हो जाएगी -दस भी नहीं मुश्किल से आपके एक ही साल में (अस्पष्ट) इसलिए अगर कोई बड़ा भारी बुद्धिस्ट बैठा होता है, तो वो एक ही साल में नज़र आ जाता है।

आपके दिल्ली में एक साहब थे। पिछले साल जब हम आये थे तो वो हमारे सामने आ के कहने लग गए, "माँ मेरा तो ये हाल हो गया है कि मेरी हिम्मत ही नहीं चलते मैं थर थर काँपता हूँ। कहीं सुगंध आती तो मेरी सांस फूलने लग जाती। मेरा ये हाल हो गया है कि मैं कहीं मंदिर मस्जिद के सामने से गुज़र नहीं सकता। कोई भगवा न का नाम लेता तो मेरा जी धक धकाने लगता है, कि यह है क्या? उनका निकाल वो बहुत तब वो ठिकाने से लगे। तो ये ही चीज़ भूत है, और इसीलिए आपको समझ लेना चाहिए ये दोनों ही चीज़ गलत हैं। बीचों-बीच रहना चाहिए। मध्य का मार्ग, यही बात बुद्ध ने भी कही। यही बात सबने कही है कि मध्य में रहना चाहिए।

अब मध्य में नाभि चक्र जो बीचों बीच है उसके बारे में कल मैंने आपको किसी और का बताया था। कि हमारे देश का नाभि चक्र खराब हो गया है। एक तो हमें परमात्मा (अस्पष्ट) इसका ही। आपको परमात्मा क्यों सुख दे, क्यों शांति दे, क्यों आनंद दे, क्यों आरोग्य दे, आपको उसकी ज्योत तक नहीं, आप उसको जानना भी नहीं चाहते, आप इधर भटक रहे हैं, उधर भटक रहे हैं, दुनिया भर की धूल छान रहे हैं। हम परमात्मा की ओर से आपसे पूछते हैं? आपने कौन सा परमात्मा के साथ न्याय किया हुआ है? उसने सारी सृष्टि आपके लिए बनाई, आप अपने सिर फुटौवल कर रहें हैं। आपस में लड़ाई झगड़ा कर रहें हैं। दो भाई भी प्रेम से नहीं रह सकते - तो क्यों परमात्मा आपके लिए कुछ करे? जो कुछ भी प्रश्न आपने आज खड़े किये हुए हैं संसार में, सारे मनुष्य के प्रश्न खड़े किये हुए हैं। ये मनुष्य ने ही तानाशाही अपना ली है और परमात्मा को भूल कर के और गलत रस्ते पर चल रहा है; फिर क्यों परमात्मा उनकी मदद करे? उसके लिए क्या है? आज आपको पैदा किया, कल आपको सबको नष्ट कर के दूसरी दुनिया बनाएगा। उसको आपसे कोई मतलब नहीं। ये तो मैं ही एक माँ हूँ जो चाहती है कि नहीं, इसको भगवान बचाए; और होने ही वाला है। आप क्या सोचते हैं? आप आराम से बैठे रहिए, वो चीज़ होने वाली है।

यह तो ठीक है अभी टाइम दिया हुआ है, आप लोग पार हो लीजिए तो ठीक है और नहीं तो कल्कि का अवतरण आने वाला है। और जब वो आएगा, वो किसी को देखने नहीं वाला, वो कोई किसी को रिऐलिज़ेशन देने वाला नहीं, लेक्चर देने वाला नहीं, मेरे जैसे आप लोगों से झिक झिक करने वाला नहीं कि, "बाबा, जमो, जमो, जमो।" वो तो एक तलवार ले कर के धड़ा धड़ सबको आखिर काट कर के ठिकाने करने वाला। और ऐसी सिचुएशन करेगा कि आपको पता नहीं चलेगा कि आप कहाँ हैं। इसलिए समझ लेना चाहिए कि ये आखिरी वक़्त हमें भी मिला है और आखिरी वक़्त भी आ गया है और हम इसे पा लें।

गलत रस्ते पे चल कर के, गलत चीज़ों में उलझ करके अपने जीवन को बर्बाद न करें। क्योंकि आपका जीवन बहुत ही महत्वपूर्ण है। कितनी मुश्किल से बनाया, देखिये आपके अंदर ये सारे चक्र परमात्मा ने बनाये हैं। पहले तो मूलाधार चक्र जैसा सुन्दर चक्र जिस पर श्री गणेश बसे हैं, फिर कुण्डलिनी की व्यवस्था जिसे आप मूलाधार कहते हैं। उसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र, जिस चक्र के कारण आप सारे, सारे सृष्टि को आप कण्ट्रोल कर सकते हैं।

देखिये हम आ रहे थे यहाँ पर, हमें लोगों ने बताया कि दिल्ली में तो ख़ूब बारिश हो रही। हमने कहा, "चिंता नहीं करो, हमें पहुँचने तो दो।" जिस दिन से हम पहुँचे बारिश बंद। एकदम बारिश बंद हो गई। कोई मुश्किल काम नहीं। हम तो कहते हैं कि सूरज-वूरज को भी करना कोई मुश्किल नहीं - इंसान को ठीक करना बड़ा ही कठिन है। सबसे मुश्किल चीज़ तो इंसान है। सूरज और चाँद और सितारे सब परमात्मा के इशारे पर चलते हैं। कोई कठिन काम नहीं है पर मनुष्य जो स्वतंत्र है, उसके सामने तो परमेश्वर भी नत मस्तक हैं। वो क्या करें, वह किस तरह से समझायें, कि "देखो, तुम्हारे अंदर कितनी सुन्दर चीज़ बनाई हुई है। इस सुन्दर चीज़ से परमात्मा को पा लो, इससे आनंद उठा लो।" लेकिन मनुष्य को दो मिनिट की चैन नहीं है, कि वो ज़रा बैठे, परमात्मा में जमे, उसमें सजग हो, उसे पाएँ और दूसरों को भी दें। उसके पास टाइम ही नहीं है, हालाँकि हर समय घड़ी बाँधे रहता है। किस चीज़ के लिए परमात्मा ने आपको टाइम दिया हुआ है? किस चीज़ के लिए? परमात्मा ने ये सारी सृष्टि की सारी चीज़ें, असल में, जिसको कहते हैं आप साइंस वगैरह, ये सब काहे के लिए खोल कर के आपको बताया हुआ है। यह सारी शक्तियाँ आपको कहाँ से मिलीं? किस चीज़ से टाइम बचाना है। सब टाइम बचाएँगे। हमें टाइम बचाना है टाइम बचाना है - काहे के लिए? कहने लगे, "वो हमें पब में जाना है, इसलिए हम टाइम बचा रहे।" क्या कहने! टाइम बचा कर के और हमें बॉलरूम में डांस करने जाने का है। ये टाइम बचाना। टाइम इसलिए बचाना है कि आप ध्यान करें, ध्यान में जमें और पाएँ, इसीलिए परमात्मा ने ये सारी शक्तियाँ आपको दीं हैं।

अब इसी के ऊपर आप देखें कि मैंने आपको नाभि चक्र के बारे में कल कहा था कि नाभि चक्र कितना महत्वपूर्ण है। इसलिए ज़्यादा नहीं बताऊँगी लेकिन नाभि चक्र से ही मनुष्य उठता है। जब उसकी दृष्टि परमात्मा की ओर उठती है, तभी वो ख़ुद भी पार होता है, तभी उसकी दृष्टि ऊपर जाती है।

उसकी जब तक खोज सत्ता, पैसा, राजकारण और दुनिया भर की बिलकुल ही निम्न स्तर की चीज़ों पे रहती है तब तक उसकी कुण्डलिनी उठने वाली नहीं है। अब ये जो चक्र है ये बहुत ही महत्वपूर्ण हमारे अंदर स्थित है और इसको संजोना चाहिए और समझना चाहिए। अपने नाभि चक्र को किस तरह से ठीक रखना चाहिए क्या करना चाहिए उसके बारे में भी आप इन लोगों से बातचीत करियेगा, ये बताएँगे आपको।

उसके ऊपर में जो चक्र है, क्योंकि बहुत ही आवश्यक चक्र है, विशेष रूप से हमारे अंदर बनाया गया है। जब कि नाभि चक्र में हमारे अंदर उत्थान की भूमिका बनाई गई, इसका मतलब उत्क्रान्ति की भूमिका बनाई गई। तब आप जानते कि दशावतरण हुआ। याने एक के बाद एक अवतार होते गए। पहले तो जैसे कि आप जानते हैं मत्स्य का अवतार हुआ माने, मछली पहले बहार आई। मछली के बाद में, जब वो ज़मीन को छू गई, तो रेप्टाइल्स हो गए, तो कछुए का अवतार हुआ।

ये सारी चीज़ें शास्त्र में भी हैं और आपने इसमें भी देखीं हैं। इसी प्रकार एक-एक जीवन आते गए। अवतार का मतलब ये नहीं कि वो गुज़र गए। वो आता है और आपको ऊपर बिठाता है। लेकिन ये जो पहले परमात्मा के अंश स्वरुप से उठता है, और आपको बताता है, आपको गाइड करता है, और आपके अंदर उनका स्थान बन जाता है।

तो इसी से, जितने भी अवतार हुए हैं, उसमें से अधिकतर अवतार भवसागर में ही रहे और वहाँ से आपकी मदद करते रहे। जिस वक़्त से भक्त लोगों ने परमात्मा को पाने का प्रयत्न किया था तब तब उसपे सैटेनिक या आसुरी लोगों ने उसे असफल किया।

उस वक़्त आपको मालूम है कि देवी ने, परमात्मा की शक्ति ने, स्वयं अवतरण लिया। ऐसे 1000 अवतरण बताये जाते हैं। कलयुग में अनेक अवतरण हुए हैं। और उन्होंने भवसागर में जो लोग पार होने के हेतु से यज्ञ आदि करते थे उनकी रक्षा करने का बहुत बड़ा काम किया और उनकी रक्षा की।

यज्ञ भी इसलिए किये जाते थे कि, जिससे सृष्टि के जो पाँच तत्व हैं, उन पाँच तत्वों को जागृत किया जाए। इसलिए यज्ञ किये जाते थे। आज उन तत्वों को जागृत करने की ज़रुरत नहीं, वह सब जागृत हो गयें हैं आपके अंदर। इसीलिए आपको इलेक्ट्रिसिटी मिलती है और आपको मैग्नेटिस्म आप इस्तेमाल करते हैं।

यह सब जागृत होने की ही वजह से आप खेती भी करते हैं और इसी वजह से आपके सारे जो कुछ आज हैं मास मैन्युफैक्चरिंग जैसे मटेरियल वह इसी वजह से खुला है क्योंकि यह पाँचों तत्व आपके जागृत हुए हैं। आज ज़रुरत है कि आपके जो धर्म हैं उसके आपको परे उठना है। उत्क्रांति की जो चरम सीमा है उसे पाना है।

यानि आपको आपकी आत्मा से पहचान करवाना - यही आपका काम है। बाकी सब कार्य हो चुका है, सिर्फ यही अंतिम कार्य आपको है। अब यह देवी के लिए मैंने आपको बताया है कि आपकी रक्षा के और उनके हज़ार नाम हैं और उनके बारे में जितना भी कहा जाए उतना कम है।

आप तो सब जानते ही हैं कि देवी शक्ति कितनी महत्वपूर्ण है। उनकी कीर्ति डायनामिक है या यह कितनी सूक्ष्म हैं इसका बताना कुछ आसान नहीं है। क्योंकि वो सब देखते हैं जो आपके अंदर हैं नहीं और उसको समझाना मुश्किल है। यानि कितनी कार्यान्वित हैं, कितनी सूक्ष्म हैं। कितनी ये प्रेममय कि एक जैसे ऊँगली मात्र घूम जाए और सारी सृष्टि को घुमा दें इतनी इसमें शक्ति है।

इसीलिए अनेक बार आपके लिए अवतरण लिया और अनेक राक्षसों का नाश किया जिससे कि आप फ्री घूम सकते हैं। अब इसके ही जो राइट साइड में जो ह्रदय चक्र है, जिसमें कि बीच में जगदम्बा का स्थान है, जो कि आपकी माँ हैं। जब आप ये भूल जाते हैं कि जगदम्बा आपकी माँ हैं, तब आपके अंदर अरक्षा का भाव, जिसको कि सेंस ऑफ़ इन्सेक्युरिटी कहते हैं। जब यह हो जाता है तो आपको श्वास की बीमारी हो जाती है - श्वास की बीमारी जिसको कहते हैं कि अस्थमा वगैरह। अस्थमा और दूसरे जो भी औरतों को जो होता है ब्रैस्ट कैंसर वगैरह, वो भी इसी सेंटर के की वजह से होता है। यह सेंस ऑफ़ इन्सेक्युरिटी जगदम्बा का स्थान लुप्त रहने से होता है और जगदम्बा का स्थान जागृत करने से ही सिर्फ ठीक होता है। जितनी भी इंसान के कैंसर वगैरह बीमारियाँ हैं, सब इस स्थान को जागृत करने से ठीक होती हैं। लेकिन जब तक आदमी यह नहीं जानता कि हमारे अन्दर जगदम्बा का स्थान है, मतलब जानना मतलब प्रभुत्व - मेरा मतलब जानने से ज्ञान नहीं - ज्ञान और बोध में बहुत अंतर है - बोध होना, जब उसे ये बोध हो जाता है कि जगदम्बा हमारे अन्दर स्थित है, तभी उसका यह स्थान ठीक होता है। इसके राइट साइड में जो चक्र दिखाई दे रहा है, वो श्री राम का स्थान है। यहाँ श्री राम का अवतरण है। ये पिता का स्थान है। लेफ्ट साइड में जगदम्बा का स्थान है, बीचों बीच जगदम्बा का, और लेफ्ट में पार्वतीजी का, जो कि हमारी माँ हैं। वह माँ का स्थान है, वो जो लेफ्ट में है। आपके अगर लेफ्ट चक्र में पकड़ा हो तो आपके माँ के बारे में अगर पूछा जाये, तो पता होगा कि या तो माँ बीमार हैं, या मर गईं हैं, या मरने को हैं। अगर लेफ्ट की बिलकुल यह स्टिल हो जाता है तो आपको ह्रदय की बीमारी होने वाली है। लेफ्ट की थोड़ी अगर पकड़ आ जाए, तो मैं देखती हूँ कि आपको ह्रदय की बीमारी है। उसके बाद जो ऊपर का चक्र है यहाँ, यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। उसका नाम विशुद्धि चक्र है। और इसमें से सोलह हज़ार नाड़ियाँ सर में से गुज़रतीं हैं - यह विराट का है। प्रीमोर्डियल मास्टर जिसे कहते हैं, प्रीमॉर्डिअल बीइंग, यह पूरी तरह प्रीमॉर्डिअल बीइंग हैं और इसके अन्दर आप लोग छोटे छोटे पेशियाँ हैं इसके ऊपर। जिसको कि अंग्रेजी में माइंड कहते हैं (अस्पष्ट) यह वो बड़ा तार जो है परमात्मा ने उसके अन्दर डाल कर के उसको भी (अस्पष्ट - झंकृत?) किया हुआ है। जब ये पेशियाँ जागृत हो जातीं हैं, तब यह विशाल देह भी जागृत हो जाती है। परमात्मा या देवी का अवतरण, जिसने आपको बनाया हुआ है, आपको मनुष्य बनाया है, और अब आप उसको जानोगे। बुद्धि में पाया, और पाया है। यही आपका पुनर्जन्म है। यही आपको बनाने वाला है और यह चक्र इसलिए बहुत ही महत्वपूर्ण है सहज योग की दृष्टि से विशेषकर। इस विशुद्धि चक्र में सारा ही श्री कृष्ण का स्थान है। श्री कृष्ण को हम अभी समझ नहीं पाते क्योंकि परमेश्वर हैं। श्री कृष्ण कितने भारी डिप्लोमैट थे मतलब, उनसे सीखना हो तो राजकारण सीखें और डिप्लोमेसी। सारी गीता उनकी डिप्लोमेसी है यह आप समझ सकते हैं। आपने क्योंकि वह इतने बड़े डिप्लोमेट थे कि उन्होंने सोचा कि यह बेफ़कूफ हैं इन बेवकूफों के आगे

सीधे हाथ से नहीं होने वाला, सीधे हाथ आने नहीं वाले।सीधे हाथ ऊँगली उनके घी नहीं निकलने वाला - उन्होंने आपको गोल घुमा के बात बताई है इसको मैं आपको थोड़े में संक्षिप्त में बताऊँगी क्योंकि काफी चीज़ें हैं बताने के लिए। गीता में कृष्ण ने पहले तो आपको बता ही दिया कि उसको पाओ, उसको जानो, उसके लिए योग करो । आप बस ख़ुद को पाओ, अपने शाँत चित्त में जानो, अपने से ऊपर लोगों को जानो - पहले चैप्टर में, यह भी अति क्योंकि वो अभी समझ लेता तो उसको कहा कि, "तुम तो कह रहे अपने को जानो, उधर कह रहे युद्ध करो, मुझे समझ नहीं आ रहा।" उनका मतलब यह था कि, जब आप साक्षी स्वरुप हो गए तब क्या (अस्पष्ट - नीति?) और क्या (अस्पष्ट)। लेकिन जब अर्जुन ने ऐसा सवाल किया तो एक पिता के स्वरुप उन्होंने बड़े उसके साथ डिप्लोमेसी की है जो आपके साथ भी (अस्पष्ट - करना चाहिए?)। हम तो माँ हैं इस कर के साफ़ साफ़ बात बता रहे हैं कि आपको बुद्धू बना रहे हैं क्योंकि आप बुद्धू बनना चाहते हैं तो फिर क्या? पिता का तरीका और होता है, माँ का तरीका और। उन्होंने इस तरह से आपको बेवक़ूफ़ बनाया कि जैसे कि समझ लीजिये कि एक बेटा है, और वह गाड़ी पर बैठा है और उसको हाँकना चाहता है और घोड़ा पीछे है, तो बाप ने आ के कहा कि, "बेटे घोड़े को आगे कर ले तभी तेरा काम चलेगा, तभी तेरी गाड़ी चलेगी।" तो बेटे ने कहा कि, "नहीं, उसको पीछे रख के मैं करूँगा।" तो बाप ने उसको आ के समझाया, वो नहीं समझा, तो कहा कि, "अच्छा, तुम हाँकते रहो सारा हाँकते रहना लेकिन चित्त घोड़े पे रखना।" जो उन्होंने कह दिया आपसे वह था चित्त परमात्मा पे रखना। जो कुछ कर्म करवा दिए कर दिए होंगे कि एक दशा तक पहुँच जाएँ। बड़ा भारी चक्कर है (अस्पष्ट) के कर्म करते रहो और सारा बोझा परमात्मा पे रखते रहो। यह हो ही नहीं सकता। ये डिप्लोमेसी, कि एब्सर्ड कंडीशंस डाल दो - एब्सर्ड कंडीशंस। अगर आप ये सोचते हों कि हम जो भी करें बड़े कर्मयोगी हैं, परमात्मा को छोड़ें इसका आपका कोई भरोसा नहीं है। करते रहिए। आपका कभी भी नहीं हो सकता क्योंकि आपका उल्लू बना के रख दिया। जब तक आपका योग न हुआ है आप कोई सा भी काम करेंगे कभी भी यह नहीं सोचते कि उसका कोई फल आपको मिला है। जब आप पार हो जाएँगे तब आप दूसरी तरह की भाषा बोलते हैं 'हो रहा है' या 'आ रहा है'। तीसरी भाषा बोलते हैं 'ये उठ रहा है, ये चल रहा है' , 'कुण्डलिनी उठ रही, ये पार हो गए'। आपका अपना बेटा भी होगा तब भी कहेंगे, "माँ क्या करें ये पार नहीं हो सकता।" जो होते हैं वो होते हैं, नहीं होते तो नहीं होते। 'कर्मण्ये वाधिका रस्ते फलेषु महा कदाचिन'। ये सारा सहज योग में (अस्पष्ट) करते हैं कि कर्म हम देखिये हम ये कुण्डलिनी उठा रहे। ऊपर तक लाये, फिर गिर गई कुण्डलिनी। अब हम क्या करें? अगर कुण्डलिनी ठहरती नहीं तो हम क्या करें? फलेषु कदाचिन। कर्म अब आप परमात्मा पे छोड़िए क्योंकि होता ही है। होने का सवाल ही नहीं हो ही नहीं सकता। आप अकर्म में आ गए। आपके हाथ से चीज़ बह रही। सूर्य हैं, वो अकर्म में बैठे हैं, उनसे आ रहा है प्रकाश जिसे सारी धरती में आप देख रहे हैं कि हरियाली छाई हुई है। एक एक पत्ते पत्ते में हरियाली कर रहे हैं लेकिन अकर्म में हैं वह भी। इनैक्टिवेली एक्टिव हैं। ख़ुदी इनएक्टिव हैं अंदर से और एक्टिव। अपनी एक्टिविटी देखते हैं और इनैक्टिविटी से रिहा कर रहें हैं। यह सिर्फ पार होने के बाद हो सकता है लेकिन जब बाहर ही इनएक्टिव है, भागते रहो ऐसे पर माँ की ओर । उसने कहा, "बेटा अब थक गया भाग भाग के (अस्पष्ट) भागना मुश्किल है।" (अस्पष्ट) ये तो मैं कहूँगी (अस्पष्ट) ये फर्क होता है तो भी (अस्पष्ट) क्या करें ? वो बात कुछ है (अस्पष्ट) भक्ति योग में भी, भक्ति योग में भी यही है। भक्ति योग में कहते हैं पुष्पम, फलम, तोयम -पुष्प, फ़ल और पानी जो भी हमें दोगे हम उसे स्वीकार्य करेंगे; लेकिन आप क्या दीजिएगा तो उसमे कह देते हैं कि तब तो तुम - ये बड़ा भारी है देखिये, उन्होंने जो कमाल का एक वर्ड इस्तेमाल किया है, उसपे किसी का ध्यान नहीं गया है, सब लोग गीता का प्रवचन सुन रहे हैं (अस्पष्ट) एक बड़ा ही अच्छा शब्द है जो कि आपकी समझ में नहीं आया। (अस्पष्ट - उनका यही तो कमाल है?) लेकिन 'अनन्य भक्ति करो' ये शब्द (अस्पष्ट) अनन्य का मतलब क्या? जब दूसरा कोई नहीं होगा। माने, आप पार हो गए तभी तो होगा। ये पकड़ है। अनन्य भक्ति करो। अनन्य कैसे करें? जब तक आप पार नहीं होंगे आप कर ही नहीं सकते। अब्सर्ड कंडीशन डाल देना चाहिए, ये डिप्लोमेसी है। ये है। कोई भी चीज़ ऐसी करो कि जिसकी अब्सर्ड कंडीशन हो, दूसरा चक्कर में आ जायेगा। जब तक अनन्य भक्ति नहीं होएगी आपकी भक्ति ही नहीं। अनन्य हो नहीं सकती जब तक आप पार नहीं होते। मतलब आपके देने का है, कि हाँ, आप पार हो जाइये। ये इसका पॉइंट है।

अगर आप समझ लें कि गीता में भी कृष्ण ने सारा सहज योग ही बताया है। उन्होंने जो लीला की हुई है इसी लीला में कि- राधाजी असल में आदिशक्ति थीं -वो जब नदी पर से जमुना जी से आतीं थीं, तो सारा पानी वायब्रेट हो गया। अब जब गोपियाँ वहाँ पानी भरने जातीं थीं, तो कृष्ण उन्हें कंकण मारते थे। वो जो वायब्रेटेड पानी सारा कुण्डलिनी पे उतरता था धड़ धड़ धड़। उससे उठाते थे वह। देखिये उनके कमाल (अस्पष्ट) थे न बचपन से ही। जब गोपियों के - छोटे से थे चार साल के तब -उन्होंने कपडे छुपा दिए। तब भी उनकी कुण्डलिनी ऊपर बैठ के जगाते थे और देख रहे थे कि कुण्डलिनी कहाँ है, क्या है। ऐसे लोग तब बैठा करते थे क्या कोई? उस ज़माने में कोई ऐसा कहता गोकुल में, "भैया ऐसे बैठो" और लेक्चर दे, तो कोई सुनता (असपष्ट)? रास, वो भी यही। 'रा' माने शक्ति और 'स' सहित। रास, रास का मतलब है 'रा' माने राधा शक्ति थी उनका हाथ पकड़वा के उनको नचाते; नाचते नाचते आदमी थक जाए ऐसे वो राधा नाचतीं लेकिन फिर नाचे और कुण्डलिनी चढ़ा रहीं। जब तक उनकी मजबूरी होती थी वो इस शक्ति को स्तेमाल करते। सारा ही उन्होंने सहज योग किया।

राम भी जब पैर में जूते पहन कर के सीताजी को ले गए थे साथ में, वो भी इसलिए, कि सारा भारतवर्ष जो है उसको वायब्रेट कर दिया जाए। नंगे पैरों से घुमाया, सबको वायब्रेट करा दिया। ये सारा नाटक रचाया हुआ है हम लोगों ने जिससे अपनी भूमि जागृत हो, अपनी भूमि पे चल कर। आठ हज़ार(सौ) साल पहले आये। आपको बताने का आज जब समय आया, जब हम आये तो देखा कि आप लोग सब अँगरेज़ हो गए। अब अंग्रेज़ों का क्या करें? वो सारी संवेदना ख़तम हो गईं, वो सारी खूबसूर्तियाँ ख़तम हो गईं, वो सादगियाँ ख़तम हो गईं, वो पवित्रता ख़तम हो गई, अब हम अपना सर पकड़ के बैठे कि अब क्या करें? अब कलश चढाने का टाइम आया तो ये हालत आपने अपनी कर ली। अभी भी परमात्मा की कृपा से अपने देहातों में काफी अच्छी तरह सादगी है और आप लोग भी अगर इस चीज़ को समझ लें और इसमें जमें, तो सहज योग बहुत अच्छे से जम सकता है। एक बात आप सब को एक साथ, आपको आश्चर्य होगा, कि किस तरह से सारा ही हवा का रूख।

अब अगर पूछा कि कम्युनिज्म अच्छा है कि डेमोक्रेसी? कैपिटलिज्म अच्छा है, कि कम्युनिज्म अच्छा है, कोई सा भी बता दें? मैंने कहा ये सबसे बड़ा कैपिटलिज्म तो पहले हुआ कि सारी आपकी शक्ति जागृत हो गई, आपकी सारी ख़ुद की सम्पदा। और दिए बगैर आपको चैन नहीं आता ये सबसे बड़ा कम्युनिज्म हुआ। आपको दिए बगैर चैन ही नहीं आने वाला यह आपका कम्युनिज्म है। और दोनों चीज़ें आगे जाकर वहीँ सहज योग में मिलीं। इसमें तो मज़ा इसी में आता है कि आप देते रहो। फिर ये नहीं मज़ा आता है कि आपके पास रुपया कितना जुटा है, आपके पास सामान कितना जुटा है आपके पास चीज़ें कितनी जुटीं हैं, पर ये आता है कि कितनों को आपने पार कराया ? इसी में मज़ा आता है, इसी में जुटा रहता है, बहाने में और देने में और अपना संचय करता रहता है ध्यान धारणा से। सारा ही इंसान की पूरी तबियत बदल जाती है, ऊपर से नीचे तक क्योंकि एक यह जीवंत चीज़ है। जिस तरह एक पेड़ अगर ख़राब हो जाये, तो उसको मनुष्य ठीक कर सकता है, यह जीवंत है, लेकिन अगर इस पेड़ को समझ लीजिये अगर इसका पाया ख़राब हो जाये, तो आप इसे ठीक नहीं कर सकते हैं। पर एक पेड़ को आप ठीक कर सकते हैं क्योंकि आप जीवंत हैं आपको लेकिन इसको पूरी तरह से समझ लेना चाहिए और जो महत्वपूर्ण है उसे पकड़ लेना चाहिए। फ़ालतू की चीज़ों में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।

आज ही एक देवीजी आईं थीं, उनकी तबियत इतनी ख़राब। मैंने कहा, "आप करती क्या हैं?" कहने लगीं, " उपवास।" हमने कहा, "दिमाग ख़राब है?" अच्छी भली बैठे, भगवान ने सारा बनाया; उपवास करने की क्या बात है? कोई बीमार पड़ते हैं अधिक खाने से और कोई पड़ते हैं उपवास से। अरे, इसमें रखा क्या है? एक बीचों बीच रहो। कोई अतिशयता पे न हो। कोई धर्मातीत गुणातीत आप उठ जाएँगे और फिर कुण्डलिनी जब विशुद्धि चक्र से लांघ कर के आज्ञा चक्र में पहुँचेगी, तब आपको पता होगा कि आप निर्विचारिता में चले जा रहे हैं। आज काफी मैंने भाषण दिया है और आप जानते हैं कि, दो तीन महीने से लगातार तीन-तीन, चार-चार बार मैं भाषण कर रही हूँ। और बहुत ही सफल विद्या। कल तो यहाँ नहीं है प्रोग्राम पर शाम को मैं कोशिश करुँगी इसलिए कि मैं पूरा इन चक्रों के बारे में बताऊँगी और सहज योग से क्या लाभ होते हैं, इसके बारे में भी शाम को बताऊँगी। आशा है आप लोग सब आयेंगे। थोड़ी देर हम लोगों को ध्यान करना चाहिए क्योंकि ध्यान में ही उपलब्धि होती है और उपलब्धि में ही सारे इसका मुख्य कारण है और मुख्य हेतु है बाकी सब ठीक है। हाँलाँकि भाषण से भी आपकी कुण्डलिनी थोड़ी सी ऊपर जाती है और इसीलिए हम इसे करते हैं और आशा है कि आप इसे पाइएगा और पाने के बाद इसमें जमिए - यह नहीं कि दो मिनिट को आये और चले गए - यह कोई सिनेमा का शो नहीं है, या कोई नाटक नहीं है, या कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि आप गए और चले गए - इसमें जमना पड़ता है। आप ख़ुद इसमें एक्टर हैं। एक्टर को एक बार शो करने से नहीं होता। आप खुद स्टेज पर हैं। स्टेज पूरा आपके लिए तैयार किया हुआ है। आप आईये और एक्टिंग करिये। ये नहीं कि आप जो आये देखा, अच्छा भला कहा और चल दिए। आप खुद स्टेज पे उतरिये और काम करिए।

आज के भाषण के बाद शाम के लिए पूजा- ध्यान होगा ५ बजे से और ७ बजे तक हम ख़तम कर देंगे क्योंकि यहाँ से जाने के लिए मेरे को काफी जगह जाना है; हाँलाँकि हम तो घडी वडी बाँधते नहीं और खासतौर इस तरफ ध्यान नहीं देते हमेशा उलटी चलती रहती हमारी घडी और ये हमारा सारा जो है (अस्पष्ट) चलते रहता है उनके काम कर कर के। काफी मस्त मौला हैं क्या करें। उसी तरह से सब काम होते रहते हैं और इस तरह से काम बनते हैं। इसलिए हमको माफ़ कर देना चाहिए अगर हम कभी देर से आयें तो वो ज़रूरी होता है क्योंकि देर से इसका मुहूर्त होता है। हमारा बड़ा मुहूर्त से काम होता है। एक अभी हम जिस (अस्पष्ट) में थे - एक तो प्रोग्राम भी हमारे पचासों रहते हैं। ये तो कहने लगे साहब, एक साहब हैं, "वहाँ बड़ी अच्छी ज़मीन है समुद्र के किनारे, वहाँ माताजी बड़ा अच्छा रहेगा बस लेकिन एक बार देख लीजिये।" और उसी दिन एक साहब ने पूजा रखी कि पूजा में आओ माने उस दिन उनका बर्थडे और बहुत प्रोग्राम (अस्पष्ट) थे। और वो ले गए कहीं साब समुन्दर के पास। वहाँ चलते चलते तीन चार मील हमारी कुछ कुछ टांगें तो उन्होंने तोड़ीं, और उसके बाद अब वापस आने में बहुत देर हो गई। हम तो आराम से आये थे। कहने लगे आये तो सब लोग बैठे थे २ बज गया। ढाई बजे पूजा शुरू हुई। तो सबने कहा, "माताजी, ढाई बजे पूजा हो रही अब खाना कब होएगा?" मैंने कहा, "खाने का एक दिन नहीं हुआ तो क्या हुआ, कौन सी आफत आ गई।" मैंने कहा, "अच्छा, ये तो पता लगाओ कि तुम्हारा खुद जन्म कब हुआ?" तो कहे, "ये तो पता नहीं।" हमने कहा, "ज़रा पता करो।" ढाई बजे तुम्हारा जन्म हुआ था इसीलिए ढाई बजे पूजा करी। और पता लगाया कि ढाई बजे का है। तो सारा कुछ पंचांग हम ले के चलते हैं। और वो पंचांग ऐसा बनता है के बराबर ठीक रहता है। अभी एक कहीं पूजा थी, राहूड़ी में; (अस्पष्ट) मेरे ख्याल से उस दिन अमावस्या थी।

योगी: राहूड़ी!

श्री माता जी: ऐ, हाँ राहूड़ी। हाँ, तो उन्होंने कहा कि, "सवेरे से हवन शुरू करिए।" हमने कहा, "हाँ, हाँ करेंगे, करेंगे," ऐसे टालते रहे, टालते रहे। करते करते चार बजा दिए। तो उन्होंने कहा कि, "माताजी हम तो सवेरे से हवन करने की सोच रहे।" मैंने कहा, "क्या है, तुम लोग तो ध्यान करोगे, ध्यान करलो, आज के दिन ऐसा भी क्या आफ़त है।" फिर मैंने कहा, "अच्छा ज़रा पता लगाओ नवमी कितने बजे चढ़ी?" क्योंकि नवमी का करने का विचार था। तो कहने लगे, "चार बजे से।" मैंने कहा, "देखो तो ज़रा" हम तो कोई भी प्लान नहीं करी। हम को कहो कोई पंचांग पढ़ें, हम नहीं जानते। लेकिन सब हमारा पंचांग अपना बना रहता, हम अपने पंचांग से चलते और तुम लोगों को भी यह सीखना चाहिए। बहुत ज़्यादा संकल्प करोगे तो 'संकल्प विकल्प करोति'। ऐसे लोग चोट खाते हैं और फिर लोग कहने लग जाते हैं कि , "माताजी, देखो हमारा ये ....।"

University of Delhi, New Delhi (India)

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