Public Program

Public Program 2002-03-24

स्थान
भाषण की अवधि
46'
श्रेणी
सार्वजनिक कार्यक्रम
भाषाएँ
अंग्रेज़ी, हिंदी
डियो
वीडियो
लाइव अनुवाद
None
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वर्तमान भाषा: हिंदी. भाषण इन भाषाओं में उपलब्ध हैं: हिंदी

यह भाषण इन भाषाओं में भी उपलब्ध है: अंग्रेज़ी, तुर्की

24 मार्च 2002

Public Program

Jawaharlal Nehru Stadium, New Delhi (भारत)

Talk Language: English, Hindi | Transcript (Hindi) - Draft | Translation (English to Hindi) - Draft

Original Hindi Talk

(This is an edited version of a transcribed original Hindi talk. The text has been corrected for OCR errors, spelling, and punctuation, and formatted into paragraphs for clarity.)

प्रेम की हमने व्याख्याएँ अनेक की हैं, पर उसकी कोई व्याख्या नहीं कर सकता। वह एक सागर है, हमारे अंदर बसा हुआ एक महान सागर है, और उसको भोगना भी हमारे ही नसीब में है। उसकी लहरें भी हमीं ज्ञात कर सकते हैं। हमारे लिए वह है। दूसरा चाहे उसे समझे या न समझे, लेकिन हमारे लिए वो एक बहुत बड़ी अद्भुत शक्ति है। शक्ति कहने से लोग सोचते हैं कि कोई मानो प्रलयंकारी चीज है। वो शान्ति देती है, वो आनंद देती है, वो सुख देती है और दुनिया के सारे प्रश्न समाप्त कर देगी अगर संसार इस प्यार में लिपट जाए।

यह प्यार जो हमारे अंदर साल दर साल अंदर ही छिपा बैठा है, अंदर ही कुम्हला रहा है, उस पर अनेक आवरण हैं। सबसे बड़ा आवरण है कि हम अपने को बहुत बड़ी चीज़ समझते हैं। आप स्वयं प्यार हैं, इससे बढ़कर आप क्या हो सकते हैं? इससे आप कौन सी बड़ी हस्ती हो सकते हैं कि आप प्यार हैं और प्यार ही हैं और कुछ नहीं हैं! यह प्यार जो आपके अंदर है, अगर यह जागृत हो जाए तो यह दुनिया भर के कोई से भी प्रश्न हों, कोई सा भी प्रश्न हो, उसको शांत कर सकता है, सबको स्वच्छ कर सकता है, सबके अंदर आनंद भर सकता है।

मनुष्य के अंदर आखिर इतना पैसा है, इतनी चीजें हैं, तो भी आखिर ये दुःखी क्यों है? अब पता चला कि इन पर दुनियाँ भर की आफतें आईं, दुनियाँ भर की परेशानियाँ आईं। समझ में नहीं आता कि इतना पैसा होते हुए भी उन पर इतनी आफतें क्यों आई हैं। सो, आजकल के जमाने में ऐसी नई-नई आफतें आई हैं। पहले नहीं होती थीं इतनी, जितनी आज हैं। गर आपके पास बहुत पैसा है तो न जाने कितने चोर आपके पास दौड़ेंगे, न जाने कितने ठग लग जाएँगे, न जाने कितने छुरा लेकर आपके पीछे दौड़ेंगे। न जाने क्या-क्या आफतें होंगी। सो पैसे से आदमी सुखी हो नहीं सकता। आप देख लीजिए, क्योंकि पैसे होने पर भी मनुष्य की लालच खत्म नहीं होती। उसको लगता है कि आज यह है तो कल वह होना चाहिए। उसकी लालच खत्म ही नहीं होती उस पैसे से, क्योंकि उस पैसे में समाधान देने की शक्ति नहीं।

गर आपके पास पैसा है तो समाधान इसमें है कि वह किसी को दे दें। गरीबों को बाँट दें, उनका दुःख हल्का करें, तब आपको समाधान मिलेगा। नहीं तो पैसे का कोई अर्थ नहीं। जो पैसा आप बाँट नहीं सकते, वो पैसा लक्ष्मी हो ही नहीं सकता। लक्ष्मी तत्त्व में, मैंने आपसे बताया है, एक हाथ से देना और दूसरे हाथ से आश्रय। तो गर आप दूसरों को आश्रय दे रहे हैं अपने पैसे के साथ, तो आपको आनंद आएगा। गर आप दुनिया की भलाई कर रहे हैं अपने पैसे से, तो उस पैसे से आपको आनंद आएगा। गर वही पैसे आप सँभाल-सँभाल कर रखें, उसका पहाड़ बनाएँ और उस पर बैठ जाएँ, कोई भी आपकी शक्ल में उसकी खुशी नज़र नहीं आएगी।

अब दूसरी बात है कि इंसान को शौक है कि वह सत्ता कमाए। सत्ता क्यों कमाए? सत्ता में क्या है? आपकी अपने ऊपर तो कोई सत्ता है नहीं, दुनिया भर में आप सत्ता करना चाहते हैं! माने हमारी बड़ी भारी पोजीशन हो जाए, सत्ता हो जाए, सब लोग हमको सैल्यूट मारें। इसमें कौन सा सुख है? अंत में यही लोग जब सत्ता से उतरते हैं, तो कोई उनकी ओर देखता भी नहीं। कोई उनको पूछता भी नहीं और वो बड़े दुःखी हो जाते हैं कि एक जमाने में तो मेरे सामने दौड़ते थे, अब मेरे पीछे भी नहीं दौड़ते।

एक साहब से मैंने पूछा, "तुम पैसा क्यों खाते हो? तुमने सत्ता पाई है तो उससे कुछ अच्छा काम करो। कुछ लोगों की मदद करो। तो तुम सत्ता में आकर के ऐसे गलत काम क्यों कर रहे हो? पैसे क्यों कमा रहे हो? झूठ क्यों बोलते हो?" तो उन्होंने कहा, "मैंने इतनी लागत लगाई है, वो तो मुझे निकालनी है।" मैंने कहा, "तुमने ये लागत लगाई क्यों?" इसलिए क्योंकि आप जीतने वाले नहीं थे। आप अगर ऐसे ही खड़े हो जाएँ तो कोई वोट नहीं देता। तो इसलिए आपने पैसे लगाए कि इस पैसे से मैं जीत जाऊँ। तो जब तक आप लोगों को पैसा देते रहे, तब-तक लोग समझेंगे कि आप किसी काम के हैं। यह वास्तविक बात है, मैं कोई नई बात नहीं कह रही हूँ। यह रोजमर्रा हम देखते हैं। पर वही आदमी, जब उसकी सत्ता खत्म हो जाती है, तो कोई उसे पूछता भी नहीं, कोई उसे देखता भी नहीं, कोई उसे जानता भी नहीं, कोई उसका मित्र भी नहीं होता। तो क्या फायदा? सारी जिन्दगी अपनी सत्ता में फँसे रहे, सारी जिन्दगी अपनी सत्ता के घमंड में फँसे रहे और आज आप कहाँ हैं?

सबसे बड़ी चीज़ है कि जो आदमी प्रेम करता है, और उसके प्यार की जिसके ऊपर छाया पड़ती है, जिसने उसका उपयोग किया हो, जिसने उसका दर्शन किया हो, जिसने भी उसका जलवा देखा है, वो पुश्त-दर-पुश्त याद रखा जाता है। याद ही की बात नहीं, पर वो ही जलवा दूसरों में भी आता है और दूसरे भी अच्छा काम करने लग जाते हैं और दूसरे भी उसी की तरह होने का प्रयत्न करते हैं।

Hindi Translation of an English Talk

(This is an edited version of a Hindi translation, originally from an English talk. The text has been corrected for OCR errors, spelling, and punctuation, and formatted into paragraphs for clarity.)

मैं प्रेम के विषय में बहुत कुछ बता चुकी हूँ, परन्तु मुझे यह सब हिन्दी में बताना पड़ा। प्रेम के विषय की अभिव्यक्ति हिन्दी में ही बेहतर होती है। आप देखते हैं कि प्रेम करने की क्षमता भारत में बहुत अधिक है। अपने प्रेम के सहारे लोग जीवन बिता लेते हैं। लोग एक-दूसरे को अपने प्रेम के माध्यम से समझते हैं। निःसन्देह, पश्चिमी संस्कृति में रंगे भारतीयों में इस गुण का अभाव है। पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित भारतीय के मन में तो अपने देश के लिए भी प्रेम नहीं है।

कुल मिलाकर भारतीय तो अत्यन्त प्रेममय हैं। आप यदि किसी निर्धन के घर जाएँ तो वह आपसे प्रेम करते हैं। आपको खाना आदि खिलाकर वो बहुत प्रसन्न होते हैं। घर में यदि कुछ उपलब्ध न हो तो वो तुरन्त बाहर से लाते हैं। वे अपने मित्रों को बताते हैं, टेलीफोन करते हैं। अतिथि की वो सेवा करते हैं। यह प्रेम-भाव पूरे विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं है। अतिथि की सेवा में प्रायः लोगों को विश्वास ही नहीं है। अन्य देशों में कहीं भी आप जाएँ, लोगों का नजरिया अत्यन्त लेखे-जोखे वाला होता है कि इससे क्या लाभ होगा।

आप यदि किसी गाँव में या कहीं अन्यत्र जाएँ तो लोग आपकी सहायता करने का प्रयत्न करेंगे। आपके विदेशी होने के कारण वे आपका सम्मान करेंगे। विदेशी या विदेश से आया व्यक्ति हमारे लिए सम्मानजनक होता है। विदेशियों के प्रति यहाँ के लोग अत्यन्त सम्मान दर्शाते हैं। परन्तु विदेशों में किसी अन्य देश से आए हुए व्यक्ति को बहुत तुच्छ माना जाता है। आप यदि विदेशी हैं तो आप उनकी दृष्टि में बहुत तुच्छ हैं। अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि ईसा-मसीह के देश में इस प्रकार का स्वभाव व संस्कृति कैसे आई! उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य तो प्रेम था। फिर क्यों उन्हें मानने वाले पश्चिमी देशों में इस प्रकार की संस्कृति पनपी, मैं नहीं समझ पाती।

यहाँ पर लोग आपकी सराहना करेंगे, आपको समझेंगे और आपको प्रेम करेंगे। अपने प्रेम को वो अभिव्यक्त करेंगे। मैंने कभी किसी सहजयोगी को विदेश में अपमानित होते हुए या कष्ट उठाते हुए नहीं देखा। वे ऐसा नहीं करते। एक बार ऐसा हुआ कि चोरी हो गई और चोर कैमरे आदि ले गए। तो मैंने उनसे कहा कि वो विदेशी हैं, आपके विषय में क्या सोचेंगे। छोटे-छोटे बच्चों ने यह कार्य किया था। मेरी बात को सुनकर उन्होंने सब कुछ लौटा दिया। अतः विदेशी हमारे लिए सम्मानजनक होते हैं, प्रेम के योग्य।

अब आप लोग यहाँ आए हैं, आप सहजयोगी हैं, आप उन्हें यह सब सिखाएँ। उन्हें केवल प्रेम एवं करुणामय ही नहीं होना, विदेशों से आए लोगों की भावनाओं को भी समझना है। निर्धन देशों से आए लोगों की देखभाल भी करनी है। इस चीज़ का इतना प्रसार होना चाहिए कि हम निर्धन लोगों की सहायता में जुट जाएँ और कष्टों से घिरे लोगों को प्रेम करने लगें। यह गुण सभी विदेशियों में पनपना आवश्यक है, विशेष रूप से सहजयोगियों में, कि वे उन लोगों के प्रति अपने हृदय में प्रेम विकसित करें जिनके पास वो सब कुछ नहीं है जो हमारे पास है।

मैं आपको बताना चाहूँगी कि ऑस्ट्रिया से आई एक महिला से मिलकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। वह यतीमखाना शुरू करना चाहती थी। कहने लगी, "श्रीमाताजी, हमें भी अवश्य कुछ करना चाहिए।" मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। मैंने उससे कहा कि चिन्ता मत करो, मैं तुम्हें सभी कुछ दूँगी। मैं तुम्हें भूमि दूँगी और भवन भी बना कर दूँगी, तुम्हें केवल यह अनाथालय चलाना है। कहने लगी, "श्रीमाताजी, हम तो इस कार्य के लिए ८० लाख रुपये एकत्र कर चुके हैं।" हे परमात्मा, तुमने किस प्रकार इतना धन एकत्र कर लिया? सभी से यह धन एकत्र किया गया। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। अन्यथा लोग ईसाई धर्म के प्रचार के लिए धन दिया करते थे।

आपको केवल इसलिए लोगों की सहायता करनी चाहिए क्योंकि उन्हें सहायता की आवश्यकता है। हो सकता है कि अगले जन्म में आपको भी सहायता की आवश्यकता पड़े। अतः बेहतर होगा कि इस प्रकार की उदारता, प्रेम और सूझ-बूझ को अपना लें और सभी मानवीय समस्याओं को समझें। मैं आपको बताती हूँ कि हमारी सारी समस्याएँ, विश्व की सभी समस्याएँ, सच्चे प्रेम से सुलझाई जा सकती हैं। इन सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है, चाहे ये भारत की समस्याएँ हों या अन्य देशों की। केवल प्रेम की कमी है। अतः आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करें; आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करके, चाहे इस बात को आप मानें या न मानें, आप प्रेम सागर में उतर जाएँगे।

परमात्मा आपको धन्य करे।

Jawaharlal Nehru Stadium, New Delhi (India)

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